The Blabber We Call Life
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)
हमारा पूरा जीवन
खोखले शब्दों की
नींव पर खड़ा है—
और फिर भी
हम ऐसे चलते हैं
जैसे सब समझते हों।
तुम कर्म करते हो
क्योंकि तुम्हें लगता है
यह ज़िम्मेदारी है।
तुम चिपके रहते हो
क्योंकि इसे प्रेम कहते हो।
तुम रुक जाते हो
कर्तव्य के नाम पर,
और दौड़ते हो
एक ऐसे भविष्य के पीछे
जिसका अर्थ
तुम्हें खुद नहीं पता।
तुम समझौता करते हो
क्योंकि सुना है—
रिश्ते बचाए जाते हैं।
प्रेम, ज़िम्मेदारी,
कर्तव्य—
ये शब्द
हमारे हर साँस में बसे हैं,
पर हमने कभी
इनसे पूछा नहीं—
“तुम हो क्या?”
हम उधार की परिभाषाओं पर
जीवन टिका देते हैं—
यह दुर्भाग्य नहीं,
यह त्रासदी है।
लोगों को
बस बात करते देखो—
मन करेगा चिल्लाने का:
यह कौन-सा पागलख़ाना है?
एक व्यक्ति
बिना जाने बोलता है,
दूसरा
बिना समझे सिर हिलाता है।
दोनों को नहीं पता
शब्द कहाँ से आ रहे हैं,
विचार किसके हैं।
फिर भी
आवाज़ में विश्वास है,
चेहरे पर समझदारी।
अज्ञान
अज्ञान को पहचान लेता है,
और उसे
संबंध कह देता है।
थोड़ी देर बाद
दोनों कहेंगे—
हम प्रेम में हैं।
एक नया नाटक
शुरू हो जाएगा।
और उस नाटक से
जो बच्चे जन्म लेंगे—
उनकी कहानी
सोचकर ही
कंपकंपी आ जाती है।
आगे का दृश्य
और भी भयानक है—
इसलिए
यहीं रुक जाना
बेहतर है।





