सकारात्मकता से मुक्ति

Freedom from Positivity
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)

जिसे तुम
“सकारात्मक” कहते हो,
वह तभी बनता है
जब भीतर
एक केंद्र खड़ा कर दिया जाता है।

केंद्र बदला,
तो अर्थ बदल गया—
आज जो सकारात्मक है,
कल वही
नकारात्मक कहलाएगा।

क्योंकि यह केंद्र
सत्य का नहीं,
अहंकार का होता है—
सीखा हुआ,
व्यक्तिगत,
डरा हुआ।

हर किसी की
अपनी positivity है,
इसलिए
यह शब्द
मार्गदर्शक नहीं,
भ्रमकारी बन जाता है।

जिसे तुम सकारात्मक कहते हो,
क्या वह
अहंकार को
अच्छा नहीं लगता?

और जहाँ अहंकार जाता है,
वहाँ द्वैत
पीछे-पीछे आता है—
सुख के साथ दुख,
हाँ के साथ नहीं।

सकारात्मकता का पीछा
नकारात्मकता को
न्यौता देना है।
आज जो मीठा है,
कल
खोखला भी हो सकता है।

आनंद जितना तीव्र,
पीड़ा का द्वार
उतना ही खुला।

इस झूले में
ऊर्जा
लगातार खर्च होती है—
पसंद और नापसंद के बीच।

सकारात्मक और नकारात्मक—
दोनों
अहं-केंद्र से जन्मे
क्षणिक मूड हैं,
सत्य नहीं।

तो फिर
इतने अस्थिर के पीछे
क्यों दौड़ना?

तुम positivity तब खोजते हो
जब भीतर
डर होता है।
चिंता होती है।
असुरक्षा होती है।

सकारात्मक विचार
दवा बन जाते हैं—
पर दवा
स्वास्थ्य नहीं होती।

अगर तुम
इतने स्थिर हो जाओ
कि किसी सहारे की
ज़रूरत न पड़े—
तो?

वह शांति
जो affirmation नहीं माँगती,
वह शांति
सच्ची है।

उन सभी आवाज़ों को
अस्वीकार करो—
बाहरी भी,
भीतरी भी—
जो कहती हैं
तुम अधूरे हो।

तुम्हें
बैसाखियों की ज़रूरत नहीं।
सहारे
खुद कमज़ोर होते हैं—
वे तुम्हें नहीं,
तुम उन्हें थामे रहते हो।

अज्ञान से
सकारात्मकता की माँग उठती है।
निर्भरता टूटते ही
positivity भी
अनावश्यक हो जाती है।

यही है
स्वतंत्रता—
न नकारात्मक से डर,
न सकारात्मक की भूख।

बस
जो है,
उसमें
स्थिर उपस्थिति।
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