“समस्या तकनीक नहीं, तुम हो”
तकनीक
न निर्दोष है,
न अपराधी—
वह
बस औज़ार है।
विनाश
खरीदने वाले में है।
अंधा उपभोग
धरती को नहीं,
पहले
मन को
खोखला करता है।
और जब तक
उपभोक्ता
जागता नहीं,
खपत
रुक नहीं सकती।
उपभोक्ता
सिर्फ़
पैसा रखने वाला नहीं,
उपभोक्ता
अहंकार है—
जो
खुद को भरने
निकला है।
कानून
प्रगति को
नहीं रोक सकते।
जिज्ञासा
मानव स्वभाव है—
हम
आगे बढ़ेंगे,
खोजेंगे,
तोड़ेंगे,
बनाएँगे।
यह ठीक है।
गलती यह है
कि हमारी जिज्ञासा
बाहर जाती है,
भीतर नहीं।
हम
दुनिया को चीरते हैं,
क्योंकि
खुद को
नहीं जानते।
पर सवाल यह नहीं—
क्या बनाया जा रहा है?
सवाल यह है—
किसके हाथ में है?
परमाणु
शहर जला भी सकता है,
रोशनी भी दे सकता है।
मसला ऊर्जा का नहीं,
बुद्धि का है।
आपूर्ति
रुकने वाली नहीं।
बाज़ार
भरते रहेंगे।
चीज़ें
बढ़ती जाएँगी।
सवाल यह है—
क्या
खरीदने वाला
समझदार है?
दुकान बंद मत करो,
ग्राहक को जगाओ।
जब माँग
सचेत होगी,
तो
उत्पादन
अपने आप बदलेगा।
शिक्षा
सूचना नहीं,
बुद्धि हो।
और बुद्धि
डिग्री से नहीं,
आत्म-बोध से
आती है।
मन सुलझाओ।
बाक़ी
सब
अपने आप
सुलझ जाएगा।





