बलात्कार जहाँ सच में शुरू होता है

“बलात्कार जहाँ सच में शुरू होता है”

बलात्कार
कोई अचानक घटित
दुर्घटना नहीं,
वह
धीरे-धीरे पनपता
हुआ
अंतिम विस्फोट है।

यह तब शुरू होता है
जब दुनिया
भोग की वस्तु
बन जाती है।

जब प्रगति का अर्थ
और ज़्यादा लेना,
और ज़्यादा तोड़ना,
और ज़्यादा जीतना
हो जाता है।

छूने से पहले
कभी पूछा—
इस स्पर्श में
प्रेम है,
या
स्वार्थ?

अगर स्पर्श
सिर्फ़
लेने के लिए है,
तो
शोषण दूर नहीं।

रेखा
बहुत पतली है।

बलात्कार
घर में शुरू होता है—
जहाँ चुप्पी सिखाई जाती है।

फ़िल्मों में—
जहाँ स्त्री
वस्तु बनती है।

चुटकुलों में—
जहाँ अपमान
हँसी कहलाता है।

नीतियों में—
जहाँ शक्ति
संवेदना से बड़ी होती है।

नदियाँ
दम तोड़ती हैं,
जंगल
नंगे हो जाते हैं,
प्रजातियाँ
नाम लिए बिना
मिट जाती हैं।

यह क्या है
अगर
सामूहिक बलात्कार नहीं—
प्रकृति का,
गरिमा का,
पवित्रता का?

जहाँ
शक्ति है
पर प्रेम नहीं,
जहाँ
तकनीक है
पर जागरूकता नहीं,
जहाँ
संपर्क है
पर श्रद्धा नहीं—

वहाँ
दुरुपयोग
अवश्य होगा।

और जब
दुरुपयोग
जीवन-शैली बन जाए,
तो
बलात्कार
अपवाद नहीं रहता,
परिणति बन जाता है।

समाधान
सिर्फ़ सज़ा नहीं,
शुद्धि है।

सिर्फ़ प्रतिक्रिया नहीं,
जीवन-पद्धति की
क्रांति है।

हमें ऐसी शिक्षा चाहिए
जो
सिर्फ़ कमाना
न सिखाए,
सिर्फ़ बहस
न सिखाए—

बल्कि
सही ढंग से
प्रेम करना सिखाए।

क्योंकि
जहाँ प्रेम और जागरूकता
उगती है,
वहाँ
यह पागलपन
जड़ नहीं पकड़ पाता।

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