पिंजरा बाहर नहीं था
तुम पक्षी हो।
उड़ना तुम्हारा स्वभाव है।
उड़ना सीखना नहीं पड़ता—
सिर्फ़
मुक्त होना पड़ता है।
फिर भी
हम अजीब हैं।
हम
दरवाज़ा खोलने के बजाय
पिंजरे के भीतर
पंख फड़फड़ाने का
अभ्यास कराते हैं।
और उसे
आध्यात्मिक साधना
कह देते हैं।
यह किसे धोखा देना है?
पक्षी को
किसी प्रशिक्षण की
ज़रूरत नहीं।
उसे चाहिए—
आकाश।
खुली जगह।
ठीक वैसे ही
तुम्हें
कुछ हासिल नहीं करना है।
तुम्हें
सिर्फ़
जो झूठ है
उसे छोड़ना है।
यही छोड़ना—
यही त्याग—
मुक्ति है।
दरवाज़ा खोलो।
पक्षी को
बाहर जाने दो।
और तब
तुम देखोगे—
जिस आराम को
तुमने पिंजरा कहा था,
वह तुच्छ था।
जिस आकाश से
तुम डरते थे,
वह तुम्हारा ही
घर था।
उड़ान
कोई विलास नहीं।
यह
कोई विशेष उपलब्धि नहीं।
यह
तुम्हारा
जन्मसिद्ध अधिकार है।
और वह पिंजरा—
जिसे तुम
परिस्थितियों में ढूँढते रहे,
लोगों में ढूँढते रहे,
व्यवस्थाओं में ढूँढते रहे—
वह
कभी बाहर था ही नहीं।
पिंजरा
तुम्हारे भीतर था।
तुम्हारी धारणाओं में।
तुम्हारी सुविधाओं में।
तुम्हारे डर में।
तुम्हारे समझौतों में।
जिस दिन
तुमने
यह देख लिया—
उसी दिन
दरवाज़ा
पहले से खुला था।
और उड़ान
कभी रुकी ही नहीं थी।





