अधूरे वादों का ढेर
मन में
जो कुछ भी आता है,
एक वादा लेकर आता है।
वादा यही होता है—
मैं तुम्हें शांति दूँगा।
यदि यह वादा न हो,
तो
वह वस्तु,
वह विचार,
वह व्यक्ति
मन के द्वार तक
पहुंच ही नहीं पाता।
मन का नियम
बहुत स्पष्ट है—
जो शांति का
आश्वासन नहीं देता,
वह भीतर
ठहर नहीं सकता।
इसलिए
मन में जो भी है,
वह
शांति के वादे के सहारे
टिका हुआ है।
पर ज़रा ठहरो—
क्या वह वादा
पूरा हुआ?
स्व
अपने आप को
अधूरा महसूस करता है।
और
जो भी
पूर्णता का
संकेत देता है,
उसी से
वह
चिपक जाता है।
वह कोई
विचार हो सकता है,
कोई सपना,
कोई व्यक्ति,
कोई पहचान,
कोई आशा।
पर प्रश्न यह नहीं है
कि वह क्या है।
प्रश्न यह है—
क्या वह
वास्तव में
वही दे रहा है
जिसकी तुम
तलाश में हो?
या फिर
वह
मन में
बेकार का
किरायेदार बन गया है—
जो
जगह घेरता है,
और बदले में
अशांति देता है?
अपने भीतर
देखो।
जो कुछ
अभी मौजूद है—
उसकी उपस्थिति
तुम्हारे जीवन में
क्या कर रही है?
जब तुम
उस विचार के साथ होते हो,
उस व्यक्ति के साथ होते हो,
उस आकांक्षा के साथ होते हो—
तो
तुम्हारी स्थिति
क्या होती है?
शांति?
या असुरक्षा?
स्पष्टता?
या उलझन?
यदि
वह तुम्हें
वही नहीं दे रहा
जिसके लिए
तुमने उसे
भीतर आने दिया था—
तो
वह
मृत भार है।
और कभी-कभी
सिर्फ़ भार नहीं—
रोग है।
तो फिर
उसे ढोने की
ज़रूरत क्या है?
उसे
हटा दो।
बिना क्रोध के,
बिना संघर्ष के—
सिर्फ़
साफ़ देखने से।
यही
साफ़ करना
स्पष्टता है।
और जहाँ
स्पष्टता है,
वहाँ
शांति
किसी वादे की
मोहताज़ नहीं रहती।





