कविता बहार

गणेश वंदना

हिंदी कविता

गणपति को विघ्ननाशक, बुद्धिदाता माना जाता है। कोई भी कार्य ठीक ढंग से सम्पन्न करने के लिए उसके प्रारम्भ में गणपति का पूजन किया जाता है। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का दिन “गणेश चतुर्थी” के नाम से जाना जाता हैं। इसे “विनायक चतुर्थी” भी कहते हैं । महाराष्ट्र में यह उत्सव सर्वाधिक […]

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Jai Sri Ram kavitabahar

राम नाम जपले रे मनवा गीत /केवरा यदु “मीरा “

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राम/श्रीराम/श्रीरामचन्द्र, रामायण के अनुसार,रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र, सीता के पति व लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के भ्राता थे। हनुमान उनके परम भक्त है। लंका के राजा रावण का वध उन्होंने ही किया था। उनकी प्रतिष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में है क्योंकि उन्होंने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता तक का त्याग किया। राम नाम जपले रे मनवा गीत राम नाम जपले रे मनवा,निश दिन सांझ सबेरे।पल में सारे कट

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होड़ लगी है विश्व में करें इकट्ठा शस्त्र

हिंदी कविता

होड़ लगी है विश्व में करें इकट्ठा शस्त्र होड़ लगी है विश्व में, करें इकट्ठा शस्त्र।राजनीतिक होने लगी,खुले आम निर्वस्त्र।। सीमाएँ जब लाँघता,है सत्ता का लोभ।जन-मन को आक्रांत कर,पैदा करता क्षोभ।। सत्ताधारी विश्व के, पैदा करें विवाद ।शांति हेतु अनिवार्य है,जनता से संवाद।। सृजनात्मक सहयोग से,बंद करें कटु युद्ध ।धरती पुत्रों अब उठो,सम्हलो स्वार्थ विरुद्ध।।

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दादा जी पर कविता

हिंदी कविता

दादा जी पर कविता दादा जी के संग में , इस जीवन के ज्ञान ।मेरे सच्चे मित्र सम ,जाते हैं मैदान ।।जाते हैं मैदान ,खेल वो मुझे सिखाते ।प्रेरक गहरी बात , कहानी रोज सुनाते ।।कह ननकी कवि तुच्छ , बताते है मर्यादा ।सबसे ज्यादा वक्त , दिया करते हैं दादा ।। दादा बनकर घूमता

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धन्य वही धन जो करे आत्म-जगत् कल्याण

हिंदी कविता

धन्य वही धन जो करे आत्म-जगत् कल्याण धन्य वही धन जो करे, आत्म-जगत् कल्याण।करे कामना धर्म की,मिले मधुर निर्वाण। संग्रह केवल वस्तु का,विग्रह से अनुबंध।सुविचारों की संपदा,से संभव संबंध।। धन-दौलत के साथ ही,बढ़ता क्यों अपराध।कठिन दंड भी शांति को,कहाँ सका है साध।। शिक्षा,जब माना गया,केवल भौतिक ज्ञान।मानव-मूल्यों के बिना,दुखद भ्राँत उत्थान।। निधन हुआ धन से

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सिद्धिविनायक गणेश वंदना

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सिद्धिविनायक गणेश वंदना सिद्धिविनायक देव हो,तुझे मनाऊँ आज।माँ गौरी शंकर सुवन,हो पूरण मम काज।। प्रथम पुज्य गणराज जी, बुद्धि विधाता नाथ।कष्ट हरो गणनायका,चरण  झुकाऊँ माथ।। मातु पिता करि परिक्रमा,सजते देव प्रधान।बुद्धि विनायक हैं कहे,कृपा करो भगवान ।। मोदक प्रिय गौरी तनय,एक दंत अखिलेश।हाथ जोड़ विनती करूँ, करो दया करुनेश।। रिद्धि सिद्धि को साथ ले, आओ

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तिजा उपास (हास्य कविता)

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

तिजा उपास (हास्य कविता) तिजा उपास रहे बर, काल करू भात खाय हे ।बिहना ले दरपन ला संगवारी बनाय हे।। 1 क‌ई किसीम रोटी पीठा झटपट बनात हे ।उठ उठ के आत हे, लस ले सुत जात हे।। 2 ल‌इका मन रोटी के,सुगंध ला पात हे ।सुंग सुंग ल‌इका मन चुलहा तीर जात हे।। 3

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तोड़े हुए रंग-बिरंगे फूल :नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

नारी जीवन और संवेदना

तोड़े हुए रंग-बिरंगे फूल टीप-टीप बरसता पानीछतरी ओढ़ेसुबह-सुबह चहलकदमी करतेघर से दूर सड़कों तक जा निकलादेखा–सड़क के किनारेलगे हैं फूलदार पौधे कईपौधों पर निकली हैं कलियाँ कईमग़र कहीं भीदूर-दूर तक पौधों परखिले हुए फूल एक भी नहींसहसा नजरें गईनहाए न धोएफूल चुन रहे पौधों सेमहिला-पुरुष कई-कईवही जो कहलाते आस्तिक जनरखे हुए हैं झिल्ली मेंतोड़े हुए

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हरिपदी छंद में गणेश वंदन

हिंदी कविता

गणपति को विघ्ननाशक, बुद्धिदाता माना जाता है। कोई भी कार्य ठीक ढंग से सम्पन्न करने के लिए उसके प्रारम्भ में गणपति का पूजन किया जाता है। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का दिन “गणेश चतुर्थी” के नाम से जाना जाता हैं। इसे “विनायक चतुर्थी” भी कहते हैं । महाराष्ट्र में यह उत्सव सर्वाधिक

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स्वभाव पर कविता

हिंदी कविता

स्वभाव पर कविता पचा लेता है विष,उसको सुधा में ढाल देता है,अँधेरा हो जहाँ दीपक जतन से बाल देता है । ये छोटी मछलियाँ हैं खैर ये कब तक मनायेंगी,बड़ी मछली के हाथों में शिकारी जाल देता है। अमन का हाल चीखें शाहराहों की बताती हैं,पहरेदार पर बचते हुए अहवाल देता है । न काटो

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विघटन पर कविता

हिंदी कविता

विघटन पर कविता विघटन की चलती क्रिया , मत होना हैरान ।नियम सतत् प्रारंभ है , शायद सब अंजान ।।शायद सब अंजान , बदलते  गौर करो तुम ।आज अभी जो प्राप्त , रहे कल होकर ही गुम ।।कह ननकी कवि तुच्छ , चिन्ह रहते हैं उपटन ।कर जाता है काम , समय पर आकर विघटन

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मूर्ख कहते हैं सभी

हिंदी कविता

मूर्ख कहते हैं सभी मूर्ख कहते हैं सभी,उसका सरल व्यवहार है,ज्ञान वालों से जटिल सा हो गया संसार है। शब्द-शिल्पी,छंद-ज्ञाता,अलंकारों के प्रभो!क्या जटिल संवाद से ही काव्य का श्रृंगार है? जो नपुंसक हैं प्रलय का शोर करते फिर रहे,नव सृजन तो नित्य ही पुरुषत्व का उद्गार है। द्वेष रूपी खड्ग से क्या द्वेष का वध हो

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