दीप पर कविता
Uncategorizedदीप पर कविता ओ दीप ! तुझे मन टेर रहा है । प्यासे मृग-सी अँखियाँ लेकर पवन-पथिक को चिट्ठियाँ देकर पथ भटके बंजारे के ज्यों पल-पल रस्ता हेर रहा है । ओ दीप ! तुझे मन टेर रहा है । देख प्राण को निपट अकेला लगा झूमने दुख का मेला बरसूँगा नित पलक-धरा पर
