कविता बहार

लिखना पर कविता

हिंदी कविता

लिखना पर कविता क्या आप कविता लिखना चाहते हैं ?यदि हाँ तो दो विकल्प है आपके पास पहला विकल्प यह कि–उनके लिए कविताएं लिखनाएक बड़ी चुनौती लेना हैइसमें कठिन संघर्ष और खतरों के अंदेशे भी हैं बहुत सारे दूसरा विकल्प यह कि–उनके लिए कविता लिखनाअवसरों के दरवाज़े खोलना हैइसमें पुरस्कार और सम्मान की संभावनाएं भी

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बेपरवाह लोग पर कविता

हिंदी कविता

बेपरवाह लोग पर कविता ये उन लोगों की बातें हैंजो लॉकडाउन,कर्फ़्यू, धारा-144जैसे बंदिशों से बिलकुल बेपरवाह हैं जो हजारों की तादात मेंकभी आनन्द विहार बस स्टेंड दिल्लीमेंयकायक जुट जाते हैंतो कभी बांद्रा रेल्वे स्टेशन मुम्बई मेंअचानक इकट्ठे हो जाते हैं ये कोई एकजुट संगठित ताकत नहीं हैकिसी सोची-समझी साज़िश का हिस्सा भी नहीं हैइनके कोई

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कोरोना चालीसा पर कविता

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कोरोना चालीसा पर कविता नर रसना के स्वाद का, कोरोना परिणाम।चमगादड़ के सूप का, मचा हुआ कोहराम।।१।। करता कोई एक है, भरता ये संसार।घूम -घूम वो नर करें, व्याधि का संचार।।२।। *चौपाइयाँ* कैसे कटे दिवस हे भाई ।लगता जीव लता मुरझाई।।१।। संकट खड़ा करें हरजाई ।कैसे इसकी हो भरपाई।।२।। महा शाप ये इस सृष्टि का

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इंसान पर कविता

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इंसान पर कविता आदिकाल में मानवनहीं था क्लीन-शेवडनहीं करता था कंघीलगता होगा जटाओं मेंभयावह-असभ्यलेकिन वह थाकहीं अधिक सभ्यआज के क्लीन-शेवडफ्रैंचकट या कंघी किएइंसानों से नहीं था वहव्याभिचार में संलिप्तनहीं था वह भ्रष्टाचारीनहीं करता था कालाबाजारीमुक्त था जाति-धर्म सेमुक्त था गोत्र-विवादों सेमुक्त था फालतू केफसादों सेवह था मात्र इंसान –विनोद सिल्ला©

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ब्रजधाम पर कविता- रेखराम साहू के दोहे

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ब्रजधाम पर कविता मधुवन काटा जा रहा, रोता है ब्रजधाम।गूँगी गाएँ गोपियाँ, छोड़ गए जब श्याम ।। कालिंदी कलुषित हुई, क्रंदन करे कदंब।नंद नहीं,आनंद में, आहत यशुदा अंब।। घर,आँगन,पनघट,गली,और दुखी हर द्वार ।पीपल,बरगद,नीम की,खोई कहाँ कतार ।। वृद्ध आम को याद है, कोयलिया की कूक।अमरैया कलकंठिनी,मुरझाई मन,मूक।। तुलसी के भी प्राण में, उग आए हैं

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काम बोलता है पर कविता

हिंदी कविता

काम बोलता है पर कविता वह बचपन से हीकुछ करने से पहलेअपने आसपास के लोगों सेबार-बार पूछता था…यह कर लूं ? …वह कर लूं ? लोग उन्हें हर बारचुप करा देते थेमाँ से पूछा-पिता से पूछादादा-दादी और भाई-बहनों से पूछापूछा पूरे परिवार सेसारे सगे संबंधियों सेदोस्त-यार और शिक्षकों से भी पूछा किसी ने भी उसे

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मानसिकता पर कविता

समाज और यथार्थ

मानसिकता पर कविता आज सब कुछ बदल चुका हैमसलन खान-पान,वेषभूषा,रहन-सहन औरकुछ-कुछ भाषा और बोली भी आज समाज की पुरानी विसंगतियां, पुराने अंधविश्वासऔर पुरानी रूढ़ियाँलगभग गुज़रे ज़माने की बात हो गई हैआज बदले हुए इस युग में-समाज मेंअब वे बिलकुल भी टिक नहीं पाती अब काम पर जाते हुएबिल्ली का रास्ता काट जानाबिलकुल अशुभ नहीं माना

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ग्रहों पर कविता

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ग्रहों पर कविता तुम जो हो जैसे होउतना ही होना तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं लग रहा हैं तुम जो भी हो उसमें और ‘होने’ के लिएकुछ लोगों को और भी जोड़ना चाहते होबहुत सारे या अनगिनत व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व में लाना चाहते होताकि तुम अपने को साबित कर सकोइस फेर में असंख्य व्यक्तियों से

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जीत पर कविता

हिंदी कविता

जीत पर कविता जब तक स्वास है ,करना अभ्यास है ।चित से प्रयास करें ,पूरी हर आस हो। परिश्रमी सच्चा जो,सफल रहे सदा वो।लक्ष्य मन में रखें,मंजिल ना दूर हो। बड़ों का आदर जहां ,सुस्वर्ग होता वहां।वंदन मन से करो ,जड़ों से जुड़े रहो । शपथ आज लेनी है ,विटप सम धीर हो ।कदम ना

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पानी पर कविता

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पानी पर कविता क्षिति जल पावक नभ पवन,जीवन ‘विज्ञ’ सतोल।जीवन का आधार वर,पानी है अनमोल।। मेघपुष्प ,पानी सलिल, आप: पाथ: तोय।*विज्ञ* वन्दना वरुण की, निर्मल मति दे मोय।। जनहित जलहित देशहित, जागरूक हो *विज्ञ*।जीवन के आसार तब, जल रक्षार्थ प्रतिज्ञ।। वारि अम्बु जल पुष्करं, अम्म: अर्ण: नीर।उदकं, घनरस शम्बरं, *विज्ञ* रक्ष मतिधीर।। सरिता तटिनी तरंगिणी,

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mahapurush

जलियांवाला बाग की याद में कविता

नारी जीवन और संवेदना

जलियांवाला बाग की याद में कविता जलियांवाला बाग के अमर शहीदों को सलाम।अमर कुर्बानी का पावन अमृतसर शुभ धाम।।तड़ातड़ चली थी निहत्थों पर अनगिनत गोलियां।कसूर था बस बोल रहे थे इंकलाब की बोलियाँ।।जनरल डायर की बर्बरता की चली थी अंधाधुंध गोलियां।महिलाओं बच्चों पर खेली गई खून की होलियां।।निर्दयी जनरल डायर को तनिक भी दया नहीं

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धीरे धीरे पर कविता-मनोज बाथरे

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धीरे धीरे पर कविता बिखरती हुई जिंदगीवीरान सी राहेंसमय गुजर रहा हैधीरे धीरेहम अपने अस्तित्व कीतलाश मेंनिकल पड़े उनराहों परमन विचलित हैउदास हैफिर भी कर रहे हैंमंजिलें तलाश हमधीरे धीरे

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