कविता बहार

सत्य पर कविता

हिंदी कविता

सत्य पर कविता मैं कल भी अकेला थाआज भी अकेला हूंऔर संघर्ष पथ परहमेशा अकेला ही रहूंगा मैं किसी धर्म का नहींमैं किसी दल का नहींसम्मुख आने से मेरेभयभीत होते सभी जानते हैं सब मुझकोपरंतु स्वीकार करना चाहते नहींमैं तो सबका हूंकिंतु कोई मेरा नहीं फिर भी मैं किसी से डरता नहींना कभी झुकता हूंना […]

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holika-dahan

होली चालीसा – बाबू लाल शर्मा

नारी जीवन और संवेदना

होली चालीसा :-चालीसा हिंदू धर्म में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा के लिए गायी जाने वाली प्रार्थना होती है। ये प्रार्थनाएँ विशेष रूप से उन देवी-देवताओं को समर्पित की जाती हैं जिन्हें मान्यता है कि उनकी शक्ति और कृपा से भक्तों की समस्त मांग पूरी होती है। चालीसा के पाठ के माध्यम से भक्त अपने मनोकामनाओं

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बंधन पर कविता

हिंदी कविता

बंधन पर कविता बंधन बांधो ईश से, और सभी बेकार।केवल ब्रह्म सत्य है,पूरा जगत असार।। बंधन केवल प्यार का,होता बड़ा अनूप।स्वार्थ भावना से रहित,होता इसका रूप।। कर्मों का बंधन हमे,बांधे इस संसार।कर्म करें निष्काम तो,होते भव से पार।। मर्यादा में जो बंधे,वह सच्चा इंसान।जो मर्यादा रहित है,पाय नही सम्मान।। मर्यादा में थे बँधे, पुरुषोत्तम श्रीराम।चले

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शादी पर गीत

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शादी पर गीत मैं चूल्हे की नाँब घुमाऊँ , लाइटर तुम जला दो ना।सब्जी मैंने छौंकी हैं जी , आकर इसे चला दो ना। प्यार करें हैं कब से दोनों , लाज रखेंगे हम इसकी।महामिलन कर सीमा तोड़े , टिकट कटा जीवन बस की। एतबार की मुहर लगाकर , छपवा देता हूँ पर्चा।जब हो जाएगी

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रजत विषय पर दोहा

नारी जीवन और संवेदना

रजत विषय पर दोहा रजत वर्ण की चाँदनी,फैल रही चहुँओर।चमक रहा है चंद्रमा, लगे रात भी भोर।। रात अमावस बाद ही , होता पूर्ण उजास।दुग्ध धवल सी पूर्णिमा,करती रजत प्रकाश।। कर्म सभी ऐसा करो , हो जाए जो खास।रजत पट्टिका में पढ़े,स्वर्णिम सा इतिहास।। रजत आब वृषभानुजा,श्याम वर्ण के श्याम।दर्शन दोनो के मिले,मिले नयन विश्राम।।

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दंगों से पहले पर कविता

हिंदी कविता

दंगों से पहले पर कविता दंगों से पहले शांत महौल थाइस शहर कादंगों से पहले नाम निशाननहीँ था वैर कादंगों से पहले अंकुरित नहीँ थाबीज जहर कादंगों से पहले सौहार्द-सदभाव काहर पहर थादंगों से पहले न साम्प्रदायिकताका कहर थादंगों से पहले सियासतदानों सेदूर शहर थादंगों से पहले असलम रामलाल सेकहाँ गैर थादंगों से पहले चुनाव

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जाति धर्म पर कविता

हिंदी कविता

जाति धर्म पर कविता इंसान-इंसान के बीचकितनी हैं दूरियांइंसान-इंसान कोनहीं मानता इंसानमानता हैकिसी न किसीजाति काधर्म काप्रतिनिधिइंसान की पहचानइंसानियत न होकरबन गई पहचानजाति व धर्म हो गई परिस्थितियांबड़ी विकटविवाह-शादीकार-व्यवहारक्रय-विक्रयसब कुछ मेंदी जाती है वरीयताअपनी जाति कोअपने धर्म कोजाति-धर्म हीसबसे बड़ी बाधा हैमानव के विकास में -विनोद सिल्ला©

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चित्र मित्र इत्र विचित्र पर कविता

हिंदी कविता

चित्र मित्र इत्र विचित्र पर कविता चित्र रचित कपि देखकर,डरती सिय सुकुमारि।अगम पंथ वनवास में, रहती जनक दुलारि।। मित्र मिले यदि कर्ण सा, सखा कृष्ण सा साथ।विजित सकल संसार भव, बने त्रलोकी नाथ।। गन्धी चतुर सुजान नर, बेच रहे नित इत्र।सूँघ परख कर ले रहे, ग्राहक बड़े विचित्र।। मित्र इत्र सम मानिये, यश सुगंध प्रतिमान।भव

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शिखण्डी पर कविता

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शिखण्डी पर कविता पार्थ जैसा हो कठिन,व्रत अखण्डी चाहिए।*आज जीने के लिए,**इक शिखण्डी चाहिए।।* देश अपना हो विजित,धारणा ऐसी रखें।शत्रु नानी याद कर,स्वाद फिर ऐसा चखे। सैन्य हो अक्षुण्य बस,व्यूह् त्रिखण्डी चाहिए।।आज जीने के……. घर के भेदी को अब,निश्चित सबक सिखाना।आतंकी अपराधी,को आँखे दिखलाना। सुता बने लक्ष्मी सम,भाव चण्डी चाहिए।।आज जीने के…….। सैन्य सीमा मीत

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सूरज पर कविता

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सूरज पर कविता मीत यामिनी ढलना तय है,कब लग पाया ताला है।*चीर तिमिर की छाती को अब,**सूरज उगने वाला है।।* आशाओं के दीप जले नित,विश्वासों की छाँया मे।हिम्मत पौरुष भरे हुए है,सुप्त जगे हर काया में। जन मन में संगीत सजे है,दिल में मान शिवाला है।चीर तिमिर…………. । हर मानव है मस्तक धारी,जिसमें ज्ञान भरा

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शिक्षा पर कविता

समाज और यथार्थ

शिक्षा पर कविता शिक्षा का अधिकार सभी कोसभी शिक्षित कीजिये।कहते है महादान इसकोदान सबको दीजिए।।1।। शिक्षा का ये क्षेत्र असीमितअनुसंधान कीजिये।अधुनातन नवतकनीकों सेजनकल्याण कीजिये।।2।। शिक्षा से कोई भी वंचितरहे ना संसार मे।शिक्षा की सब अलख जगाएंहर एक परिवार में।।3।।???शिक्षा जीवन का मूल मंत्रसबको सुलभ कराएं।मेहनतकश और शोषित भीसब जन शिक्षा पाएं।।4।। बुनियादी शिक्षा को घर

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सार छंद विधान – बाबूलालशर्मा

हिंदी कविता

सार छंद विधान ऋतु बसंत लाई पछुआई, बीत रही शीतलता।पतझड़ आए कुहुके,कोयल,विरहा मानस जलता। नव कोंपल नवकली खिली है,भृंगों का आकर्षण।तितली मधु मक्खी रस चूषक,करते पुष्प समर्पण। बिना देह के कामदेव जग, रति को ढूँढ रहा है।रति खोजे निर्मलमनपति को,मन व्यापार बहा है। वृक्ष बौर से लदे चाहते, लिपट लता तरुणाई।चाह लता की लिपटे तरु

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