कविता बहार

दिल की बात बताकर देखो

हिंदी कविता

दिल की बात बताकर देखो दिल की बात बताकर देखोमन में दीप जलाकर देखो।कौन किसी को रोक सका हैनाता खास निभाकर देखो।आँखों की बतिया समझो तोलब पर मौन सजाकर देखो।इश्क़ सफ़ीना सबका यक साथोड़ा पार लगाकर देखो।लोग जगत सब मैला यारोंमन का वहम मिटाकर देखो।रब का एक नज़रिया सब परऐसा भाव जगाकर देखो। राजेश पाण्डेय […]

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मंज़िल पर कविता

हिंदी कविता

मंज़िल पर कविता   सूर्य की मंज़िल अस्ताचल तक,तारों की मंज़िल सूर्योदय तक।नदियों की मंज़िल समुद्र तक,पक्षी की मंज़िल क्षितिज तक। अचल की मंज़िल शिखर तक,पादप की मंज़िल फुनगी तक।कोंपल की मंज़िल कुसुम तक,शलाका की मंज़िल लक्ष्य तक। तपस्वी की मंज़िल मोक्ष तक,नाविक की मंज़िल पुलिन तक।श्रम की मंज़िल सफलता तक,पथिक की मंज़िल गंतव्य तक।

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उपवन की कचनार कली है

हिंदी कविता

            उपवन की कचनार कली है उपवन की कचनार कली है ।घर भर में  रसधार ढ़ली  है ।।यह दुहिता जग भार नहीं है ।अवसर दो  हकदार नहीं है ।।समय सुधा रस सिंचित  बेटी ।पथ गढ़ती अब किंचित बेटी ।।नव  युग  प्रेरक है अब  देखो ।सृजन महत्व मिला सब देखो ।।अब खुद  जाग रही सपने में ।हक

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माँ पर कविता

हिंदी कविता

    माँ पर कविता   बड़ी हसरत भरी आँखे लिए क्या           ताकती है माँ ।नहीं कहती जुबाँ से वो मगर कुछ           चाहती है माँ ।।बदलते रोज हम कपड़े नये फैशन             जमाने   के ,तुम्हे कुछ है पता साड़ी पुरानी           टांकती है माँ ।अगर कोई कभी आये तुम्हारे घर            जरा    देखो ,कमी कोई न हो अक़सर झरोखे           झांकती

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फागुन में पलाश है रंगों भरी दवात

हिंदी कविता

फागुन में पलाश है रंगों भरी दवात फागुन में पलाश है, रंगों भरी दवात ।रंग गुलाबी हो गया, इन रंगों के साथ ।।अँखियों से ही पूछ गया, फागुन कई सवाल ।ख्बावों का संग पा लिया, ये नींदें कंगाल ।।पलट-पलट मौसम तके, भौचक निरखें धूप ।रह-रहकर चित्त में हँसे, ये फागुन के रूप ।।फूलों भरी फुलवारियाँ,

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फागुन आ गया

हिंदी कविता

     फागुन आ गया हर्षोल्लास था गुमशुदादौर तलाश का  आ गया।गुम हुई खुशियों को लेकरफिर से  फागुन आ गया॥झुर्रियां  देखी जब चेहरे पर लगा बुढ़ापा आ गया।उम्र की सीमा को तोड़करउत्साही फागुन आ गया॥अहंकार का घना कोहराएकाकीपन  छा गया।अंधेरों को चीरकर लोउजला  फागुन आ गया॥पहरा गहरा था गम  काअवसाद  मन में छा गया।टूटे दिलों के तार

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बासंती फागुन

हिंदी कविता

⁠⁠⁠ बासंती फागुन ओ बसंत की चपल हवाओं,फागुन का सत्कार करो।शिथिल पड़े मानव मन मेंफुर्ती का  संचार करो।1बीत गयी है आज शरद ऋतु,फिर से गर्मी आयेगी.ऋतु परिवर्तन की यह आहट,सब के मन को भायेगी।2कमल-कमलिनी ताल-सरोवर,रंग अनूठे दिखलाते।गेंदा-गुलाब टेसू सब मिलकरइन्द्रधनुष से बन जाते।3लदकर मंजरियों से उपवन,छटा बिखेरें हैं अनुपम।पुष्पों से सम्मोहित भँवरें,छेड़ें वीणा सी सरगम।4अमराइयों

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हसरतों को गले से लगाते रहे

हिंदी कविता

हसरतों को गले से लगाते रहे हसरतों को गले से लगाते रहे,थोड़ा थोड़ा सही पास आते रहे..आप की बेबसी का पता है हमें,चुप रहे पर बहुत ज़ख़्म खाते रहे..इस ज़माने का दस्तूर सदियों से है,बेवजह लोग ऊँगली उठाते रहे..मेरी दीवानगी मेरी पहचान थी,आग अपने ही इसमें लगाते रहे..इश्क़ करना भी अब तो गुनह हो गया,हम

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कैसे जुगनू पकड़ूं?

हिंदी कविता

कैसे जुगनू पकड़ूं? पाँव महावर ,हाथों में मेहँदीकलाई में कँगना दिये सँवार ।माथे बिंदिया माँग में सिंदूरमंगलसूत्र गले दिया सँवार ।जननी पर भूल गयी बतानाघर गृहस्थी कैसे सँभालूबाली उमरिया लिखने पढ़नेखेलने की ,कैसे बिसरा दूँ ।मेहँदी रचे हाथों में कलछीकलम कैसे पकडूँगी अब ।पाँव सजे बिछिया महावरजूते मौजे कैसे पहनूँगी अब ।बेड़ी डाली कैसी तुमने

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किस मंजिल की ओर ?

समाज और यथार्थ

किस मंजिल की ओर ? क्यारी सूख रही है निरंतर..आग जल रही हैं हर कहीं..घर हो या पास पडौ़स ..विश्वास की डोर नहीं है…टूट रही हैं नित ख्वाहिशेंनहीं  रहा है भाईचारा…प्रेम…स्नेह छूट गया है..कहीं दूर…अंतरिक्ष सदृश्य..वैमनस्य पलने लगा है नजरों में..अंधकार छा रहा है… बादल धुलते नहीं है… अबमन की कालिख…दिल की काल कोठरी मेंईर्ष्या

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सिर पर है चुनाव

हिंदी कविता

सिर पर है चुनाव बीच बवंडर गोते खाती, फंस गई जैसे नाकुछ ऐसा माहौल बना है, सिर पर है चुनावउबड़ खाबड़ गड्ढे वाले, अब दिखते है गांवये अब तो मुद्दा है भैया, सिर पर है चुनावअपनी मांगे हमको तुम , झट से बतलावलगे हाथ झट पूरी होंगी,सिर पर है चुनावबरसों से है गांव अंधेरा, खम्भे

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स्वयंसिद्धा

हिंदी कविता

स्वयंसिद्धा देहरी को लाँघने ,साहस सदा तुममें रहा,अधिकार के सत्कार मेंकर्तव्य की कारा बना,क्यूँ  प्रश्न वाचक तुम बनी,अवधारणा को तोड़खोल पाँखे खोलहै तू सदा से ही ,जगतनियन्ता ने बनायासृष्टि के आदि से,पुराण, वेद, उपनिषद्कालातीत से कालांतरगढ़ा है ,सुझाया,जन्म जन्मातर से होदेवी तुम,स्वयंसिद्धा। ✍✍✍✍✍✍✍✍डॉ मीता अग्रवाल रायपुर छत्तीसगढ़कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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