भय कभी भय बनकर नहीं आता
हिंदी कविताभय कभी भय बनकर नहीं आता तुम सोचते होदुनिया बाँध रही है तुम्हें।पर सच यह है—डोरियाँ तुम्हारे भीतर हैं। भय कभीभय बनकर नहीं आता।वह प्रेम का मुखौटा पहनता है,कर्तव्य कहलाता है,ज़िम्मेदारी बन जाता है,पर भीतर सेकाँपता रहता है। भय है जब कहा जाता है—शादी कर लो,बुढ़ापे में अकेले रह जाओगे।तुम साथ नहीं खोजते,तुम बीमा खरीदते
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