हिंदी कविता

20 सितंबर: 1857 का दिल्ली संग्राम (विशेष कविता)

1857 का दिल्ली संग्राम और 20 सितंबर का इतिहास: एक अमर क्रांति गाथा

देशभक्ति, हिंदी कविता

भारत का इतिहास शौर्य, त्याग और बलिदान की अनगिनत गाथाओं से भरा पड़ा है। जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (First War of Indian Independence) की बात होती है, तो हमारे मन में देशभक्ति की एक लहर दौड़ जाती है। 20 सितंबर का दिन भारतीय इतिहास में एक ऐसा ही महत्वपूर्ण और भावुक दिन

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मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं(Nothing Lasts but the Joke) किसी को“परे”,“अटल”,“सदैव”का दर्जा मत दो। यहाँकुछ भीअविनाशी नहीं। दिखाओ मुझे—जो आज जैसा हैवैसा हीकल भी रहे। दिखाओ मुझे—जो तुम्हारी उम्मीदों सेकभी विश्वासघात न करे। बुद्धिमान जानता है—स्थितियाँ खेल हैं।आज यह,कल कुछ और। वे किसी की नहीं होतीं।न वफ़ादार,न प्रतिबद्ध।क्षणिक—जुगनू की रोशनी जैसी। ध्यान से देखो—जो

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दर्द में खेलो

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द में खेलो दर्द में खेलो।दर्द के साथ खेलो।बसखेलते रहो। दर्द है—हाँ।पर जबकिसी सार्थक चीज़ मेंपूरी तरह डूबे हो,तो क्यादर्द परध्यान बचता है? वहकिनारे चला जाता है।केंद्र नहीं बनता।उद्देश्य कोहाइजैक नहीं करता। एक साधारण खिलाड़ी भीयह जानता है—जीत की दौड़ मेंदर्ददूसरे नंबर पर होता है। जब तकस्ट्रेचर न आए,खेलरुकता नहीं। दोपहर का सूरजआग उगल रहा

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समस्या सेक्स नहीं, खालीपन है

समाज और यथार्थ

समस्या सेक्स नहीं, खालीपन है सेक्स समस्या नहीं है।समस्या है—भीतर का खालीपन। जब तुम नहीं जानतेकि तुम कौन हो,तब इच्छातुम्हें खींचती है,घसीटती है,शासित करती है। सेक्ससरल है,जैविक है।पर आसक्ति—जटिल है,मानसिक है। तुम भूखे हो,पर यह भूखदेह की नहीं।तुम्हें लगता हैसेक्स तृप्त करेगा—पर वह वादा करता है,पूरा नहीं करता। हम बिना आत्म-बोध के जीते हैं।और उसी

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प्रोग्राम की गई भावनाएँ

समाज और यथार्थ

प्रोग्राम की गई भावनाएँ भावनाएँजन्मजात नहीं होतीं—वेसंस्कारों की भाषा हैं। सोचजैसेमानसिक ढर्रों सेउगती है,वैसे हीभावशरीर और समाज कीजमी हुईलकीरों सेफूटते हैं। भाव उठेउससे पहले हीरसायनअपना कामशुरू कर चुके होते हैं। हार्मोनघंटी बजा देते हैं—और मननाम दे देता है। भावनासोच सेगहरी लगती हैक्योंकिउसमेंदेह का वजन है। इसीलिएवहअपरिहार्य,पवित्र,“दिल से निकली”महसूस होती है। परयह भ्रम है। क्रोध,भय,कामना,आसक्ति—येजंगल की

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पुरुष को एक ओर रखो

आध्यात्म और भक्ति, हिंदी कविता

पुरुष को एक ओर रखो स्त्री के संसार का केंद्रपुरुष नहीं होना चाहिए,और पुरुष के संसार का केंद्रस्त्री नहीं। यह व्यवस्थाजंगल की है,मनुष्यता की नहीं। जब तकशरीर, हार्मोन,मातृत्व,और घोंसलाजीवन का केंद्र बने रहते हैं,मुक्तिकेवल शब्द रह जाती है। जिस दिनशरीर मालिक नहीं रहता,उसी दिनपुरुष भीआसक्ति नहीं रहता। रुको,और खुद से पूछो—जिसे तुमइतना महत्वपूर्ण मान रही

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यह तुम्हारी नियति नहीं है!

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

यह तुम्हारी नियति नहीं है! तुमकुछ बनने नहीं आए हो।तुमकुछ याद करने आए हो। जिसे तुमखोज रहे हो—वहकभी खोया ही नहीं। खोजने वालाझूठा है।जिसे खोजना है,वहपहले सेमौजूद है। अपनीमूल सत्ता कोमत भूलो—वहतुम्हारेआज के अनुभवों सेकहीं आगे है। तुमअसीम हो।अपरिमेय। भले हीतुम्हारेखाने,सोचने,जीने के ढंग मेंइसकाकोई प्रमाण न दिखे। आदतेंइसे नहीं दिखातीं।चुनावइसे व्यक्त नहीं करते। फिर भीयह

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जीवन भरो, वरना वह खुद भर जाएगा

हिंदी कविता

जीवन भरो, वरना वह खुद भर जाएगा अगर तुमअपने जीवन कोऊँचाई से नहीं भरोगे—आनंद से,बोध से,सौंदर्य से,पवित्रता से—तो जीवनखुद को भर लेगा। और वह भरेगाकचरे से। कभी नौकरी के नाम पर,कभी रिश्तों के बोझ में,कभी किसी और शोर में—जो दिखेगा ज़रूरी,पर होगा खोखला। मनुष्यआलस्य के लिए पैदा नहीं हुआ।वहसंघर्ष में जन्म लेता है।पूरा जीवनएक रणभूमि

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खोल से बाहर

मन और भावनाएँ

खोल से बाहर आकाश से प्रेमकोई भावना नहीं है।वह एक असहजता है—उस हर सीमा के प्रतिजिसे तुमने कभीघर मान लिया था। हर जीवनकिसी न किसी खोल मेंशुरू होता है।खोल सुरक्षा देता है,ऊष्मा देता है,पहचान देता है।शुरुआत मेंवह आवश्यक होता है। पर जो आवश्यक था,वहीस्थायी नहीं हो सकता। एक बिंदु आता हैजब वही खोलजिसने बचाया था,दम

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प्रेमहीन काम, आनंदहीन जीवन

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

प्रेमहीन काम, आनंदहीन जीवन अगर कामप्रेम योग्य नहीं है,तो जीवनजीने योग्यकैसे होगा? कामदिन की एक फ़ाइल नहीं,वहतुम्हारी पहचान की धुरी है—दिन उसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं,सोच उसी से आकार लेती है,रिश्तेउसी की छाया में साँस लेते हैं। काम को छोटा समझनाअपने अस्तित्व केकेंद्र को नकारना है। जहाँ तुम खड़े होऔर जो तुम करते हो—उनके बीचफाँक

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समय नहीं उड़ता, तुम बह जाते हो

समय और जीवन दर्शन, हिंदी कविता

समय नहीं उड़ता, तुम बह जाते हो समयकहीं भागता नहीं।वहतुम्हारे पीछे-पीछेचलता है। जैसा तुम मूल्य देते हो,वैसा हीसमय बँटता है। हर क्षणतुम स्वयं तय करते हो—ध्यान कहाँ जाएगा,ऊर्जा किसे मिलेगी,जीवन किस दिशा मेंढलेगा। भटकाव,कर्तव्य,इच्छाएँ—सबतुम्हारी प्राथमिकताओं केअनुवाद हैं। समयकोई रहस्य नहीं।वहएक दर्पण है—जो दिखाता हैकि तुम्हारे भीतरवास्तव मेंमहत्त्वपूर्ण क्या है। इसलिए जब तुम कहते हो—“पता ही

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दर्द तब होता है जब कल्पना टूटती है

विरह और दर्द, हिंदी कविता

Hurt Is When Fantasy Breaks(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) चोटअचानक नहीं लगती,वह उसी जगह लगती हैजहाँतुम्हारा लगावसबसे गहरा होता है। अगर दुख है,तो उसेभाग्य या दूसरे पर मत डालो—अपनेआसक्ति को देखो। दर्दकिसी घटना का नाम नहीं,वह उस कहानी का टूटना हैजिसे तुमचुपचापपाले हुए थे। एक तस्वीर थी,एक उम्मीद थी,एक विश्वास था—और यथार्थ नेउसे मानने सेइनकार

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