जाति पर कविता
हिंदी कविताजाति पर कविता जातिजाती ही नहींबहुत हैं गहरीइसकी जड़ेंजिसे नितसींचा जाता हैउन लोगों द्वाराजिनकी कुर्सी कोमिलता है स्थायित्वजाति सेजिनका चलता है व्यवसायजाति सेजिन्हें मिला है ऊंचा रुतबाजाति सेजिन्हें परजीवी बनायाजाति नेवे चाहते हैंउनकी बनी रहे सदैवजाति आधारित श्रेष्ठताभले ही इससेकिसी काकितना ही शोषणक्यों न हो? -विनोद सिल्ला©
