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सुलगता हुआ शहर देखता हूँ
माँ गंगा का अवतरण दिवस
तुम पर लगे इल्जामातमुझे दे दो
मेरे वो कश्ती डुबाने चले है
मानवता की छाती छलनी हुई
कंगन की खनक समझे चूड़ी का संसार
धूल पर दोहे
बस तेरा ही नाम पिता
डाँ. आदेश कमार पंकज के दोहे
सामाजिक बदलाव पर छत्तीसगढ़ी कविता
17 मई विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर एक कविता
मानव समानता पर कविता
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