वर्षा ऋतु पर कविता -हरीश पटेल
प्रकृति और पर्यावरणवर्षा ऋतु पर कविता आज धरा भी तप्त हुई है।हृदय से शोले निकल पड़े हैं।।कण-कण अब करे पुकार ।आ जाओ वर्षा एक बार।। प्यास अब उमड़ चुकी है ।जिंदगी को बेतरतीब कर विक्षिप्त पड़ा है।।तुम पहली बूंद बन कर आ जाना ।तुम वर्षा हो आकर बरस जाना ।।निर्जीव सदृश यह काया है, रूह बनकर समा
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