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कर्म देवता
शपथ उठाती हूं मैं भारत की बेटी
कोठी तो बढ़हर के छलकत ले भरगे
कहें सच अभी वो जमाना नहीं है
बाते सोलह आने सच है
कविता मेरी ऐसी हो
जीवन की है परिभाषा
कविता क्या है?
करना हो तो काम बहुत हैं
हमारी भाग्य विधाता मां
समय -देवता
तू ही मेरा प्रारब्ध है माँ”
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