हिंदी कविता

तन पर कविता-रजनी श्री बेदी

हिंदी कविता

तन पर कविता हर मशीन का कलपुर्जा,मिल जाए तुम्हे बाजार में।नहीं मिलते हैं तन के पुर्जे,हो  चाहे उच्च व्यापार में। नकारात्मक सोचे इंसा तो, सिर भारी हो जाएगा।उपकरणों की किरणों से  , चश्माधारी  हो जाएगा।जीभ के स्वादों के चक्कर में,न डालो पेनक्रियाज को मझधार में।नहीं मिलते हैं तन के पुर्जे,हो चाहे उच्च व्यापार में। तला हुआ जब

तन पर कविता-रजनी श्री बेदी Read More »

शांतिदूत पर कविता -शांति के दीप जलाते हैं

हिंदी कविता

शांतिदूत पर कविता -शांति के दीप जलाते हैं विश्व पटल पर मानवता के फूल खिलाते हैं,हम हैं शांतिदूत, शांति के दीप जलाते हैं। भेद भाव के भवसागर में,दया भाव भरली गागर में,त्रस्त हृदय को दया कलश से सुधा पिलाते हैं। मानव बन मानव की खातिर, दूर करें अज्ञान का तिमिर,इस वसुधा पर ज्ञान पताका हम फहराते

शांतिदूत पर कविता -शांति के दीप जलाते हैं Read More »

हाइकु

हाइकु मंजूषा -पद्ममुख पंडा स्वार्थी

हिंदी कविता

हाइकु मंजूषा 1चल रही हैचुनावी हलचलप्रजा से छल 2 भरोसा टूटाकिसे करें भरोसासबने लूटा 3 शासन तंत्रबदलेगी जनताहक बनता 4 धन लोलूपनेता हो गए सबअब विद्रूप 5 मंडरा रहाभविष्य का खतराचुनौती भरा 6 खल चरित्रजीवन रंगमंचन रहे मित्र 7 प्यासी वसुधाजो शान्त करती हैसबकी क्षुधा 8 नदी बनाओजल संरक्षण कावादा निभाओ 9 गरीब लोगनिहारते गगननोट

हाइकु मंजूषा -पद्ममुख पंडा स्वार्थी Read More »

वर्षा ऋतु कविता – कवयित्री श्रीमती शशिकला कठोलिया

प्रकृति और पर्यावरण

वर्षा ऋतु कविता  ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड तपिश, प्यासी धरती पर वर्षा की फुहार,       चारों ओर फैली सोंधी मिट्टी,प्रकृति में होने लगा जीवन संचार। दिख रहा नीला आसमान ,सघन घटाओं से आच्छादित ,वर्षा से धरती की हो रही ,श्यामल सौंदर्य द्विगुणित ।  छाई हुई है खेतों में ,सर्वत्र हरियाली ही हरियाली ,नाच रहे हैं

वर्षा ऋतु कविता – कवयित्री श्रीमती शशिकला कठोलिया Read More »

संयुक्त राष्ट्र दिवस पर कविता-अरुणा डोगरा शर्मा

हिंदी कविता

संयुक्त राष्ट्र दिवस पर कविता मैं पृथ्वी,सुनाती हूं अपनी जुबानी साफ जल, थल, वायु से,साफ था मेरा जीवमंडल।मानव ने किया तिरस्कार,बर्बरता से तोड़ा मेरा कमंडल।दूषित किया जल, थल, वायु को की अपनी मनमानी ।मैं पृथ्वी,सुनाती हूं अपनी जुबानी। उत्सर्जन जहरीली गैसों का, औद्योगिकरण का गंदा पानी, वन नाशन,अपकर्ष धरा का निरंतर बढा़ता चला गया।ऋषियो, मुनियों ने माना था,मुझे कुदरत का

संयुक्त राष्ट्र दिवस पर कविता-अरुणा डोगरा शर्मा Read More »

शांति पर कविता -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

शांति पर कविता  हम कैसे लोग हैंकहते हैं—हमें ये नहीं करना चाहिएऔर वही करते हैंवही करने के लिए सोचते हैंआने वाली हमारी पीढियां भीवही करने के लिए ख़्वाहिशमंद रहती हैजैसे नशाजैसे झूठजैसे अश्लील विचार और सेक्सजैसे ईर्ष्या-द्वेषजैसे युद्ध और हत्याएंऐसे ही और कई-कई वर्जनाओं की चाह हम नकार की संस्कृति में पैदा हुए हैंहमें नकार सीखाया

शांति पर कविता -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र Read More »

सुंदर विश्व बनाएं-डॉ नीलम

हिंदी कविता

सुंदर विश्व बनाएं मानव के हाथों में कुदालखोद रहा अपने पैरों से रहा अपनी जडे़ निकाल अपने अपने झगडे़ लेकरकरता नरसंहार हैविश्व शांति के लिए बसबना संयुक्त राष्ट्र है निःशस्त्रिकरण की ओट मेंअपने घर में आयुध भंडार भरेपरमाणु की धौंस जता करकमजोरों पर वार करें कितनी कितनी शाखाएँ खोलींपर विश्व ना सुखी हुआएक देश कुपोषित होतादूजा महामारी

सुंदर विश्व बनाएं-डॉ नीलम Read More »

संयुक्त राष्ट्र पर कविता- दूजराम साहू

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

संयुक्त राष्ट्र पर कविता आसमान छूने की है तमन्ना, अंधाधुंध हो रहे अविष्कार! चूक गए तो विनाशकारीसफलता में जीवन उजियार! !  विज्ञान वरदान ही नहीं, अभिशाप भी है, कहीं नेकी करता तो कहीं पाप भी है! उन्नति में लग जाए तोकर दे भव से पार ! चूक गए तो विनाशकारीसफलता में जीवन उजियार ! !  निर्माण के इस पावन युग

संयुक्त राष्ट्र पर कविता- दूजराम साहू Read More »

घर वापसी- राजेश पाण्डेय वत्स

हिंदी कविता

घर वापसी नित नित शाम को, सूरज पश्चिम जाता है। श्रम पथ का जातक फिर अपने घर आता है।  भूल जाते हैं बातें थकान और तनाव की ,अपने को जब जबपरिवार के बीच पाता है।  पंछियों की तरह चहकतेघर का हर सदस्य,घर का छत भी तब अम्बर नजर आता है।  कल्प-वृक्ष की ठंडकता भी फीकी सी लगने लगे शीतल पानी का गिलासजब

घर वापसी- राजेश पाण्डेय वत्स Read More »

वक़्त से मैंने पूछा-नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

वक़्त से मैंने पूछा      वक़्त से मैंने पूछाक्या थोड़ी देर तुम रुकोगे ?वक़्त ने मुस्करायाऔरप्रतिप्रश्न करते हुएक्या तुम मेरे साथ चलोगे?आगे बढ़ गया…। वक़्त रुकने के लिए विवश नहीं थाचलना उसकी आदत में रहा है सो वह चला गयातमाम विवशताओं से घिरा मैं चुपचाप बैठा रहावक्त के साथ नहीं चलापरवक्त के जाने के बादउसे हर पल

वक़्त से मैंने पूछा-नरेन्द्र कुमार कुलमित्र Read More »

दिखा दे अपनी मानवता- शशिकला कठोलिया

हिंदी कविता

दिखा दे अपनी मानवता लेकर कोई नहीं आया ,जीवन की अमरता ,क्षणभंगुर संसार में ,दिखा दे अपनी मानवता । देशकाल जाति पाति की ,दीवारों को तोड़कर ,छुआछूत ऊंच नीच की ,सबी विविधता को हर ,हर इंसान के मन से ,मिता दे विविधता, क्षणभंगुर संसार में ,दिखा दे अपने मानवता । हंसना है तो ऐसे हंसो,हंसे तुम्हारे

दिखा दे अपनी मानवता- शशिकला कठोलिया Read More »

मैं हूं एक लेखनी-शशिकला कठोलिया

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

मैं हूं एक लेखनी मैं हूं एक लेखनी ,क्यों मुझे नहीं जानता ,निरादर किया जिसने ,जग में नहीं महानता।जिसने मुझे अपनाया ,हुआ वह बड़ा विद्वान ,जिसने किया आदर ,मिला यश और सम्मान ,मेरे ही द्वारा हुआ ,रचना महाभारत रामायण ,साहित्यो का हुआ विमोचन ,ज्ञान विज्ञान का लेखन ,देश में हुए वृहद कार्य, मेरे ही भरोसे बल

मैं हूं एक लेखनी-शशिकला कठोलिया Read More »

Scroll to Top