हिंदी कविता

हे सुरूज देंवता अतका झन ततिया

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हे सुरूज देंवता अतका झन ततिया हे सुरूज देंवता अतका झन ततिया।तोर हाँथ जोरत हँव तोर पाँव परत हँव आगी झन बरसा।।चिरई चिरगुन के खोंधरा तिप गे अंड़ा घलो घोलागे।नान्हे चिरई उड़े बर सीखिस ड़ेना ओकर भुंजागे।रूख राई जम्मो झवांगे अतका झन अगिया।हे सुरूज देंवता अतका झन ततिया।बेंदरा भालू पानी पिये बर बस्ती भीतर खुसरगे।हिरन […]

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मुहब्बत में ज़माने का यही दस्तूर होता है

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मुहब्बत में ज़माने का यही दस्तूर होता है जिसे चाहो नज़र से वो ही अक्सर दूर होता हैमुहब्बत में ज़माने का यही दस्तूर होता हैबुलंदी चाहता पाना हरिक इंसान है लेकिनमुकद्दर साथ दे जिसका वही मशहूर होता है । सभी के हाथ उठते हैं इबादत को यहाँ लेकिनख़ुदा को किसका जज़्बा देखिये  मंजूर होता है।उलटते

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गर्दिश में सितारे हों

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गर्दिश में सितारे हों गर्दिश में सितारे हों जिसके, दुनिया को भला कब भाता है,वो लाख पटक ले सर अपना, लोगों से सज़ा ही पाता है। मुफ़लिस का भी जीना क्या जीना, जो घूँट लहू के पी जीए,जितना वो झुके जग के आगे, उतनी ही वो ठोकर खाता है। ऐ दर्द चला जा और कहीं,

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प्यार का पहला खत पढ़ने को

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प्यार का पहला खत पढ़ने को प्यार का पहला खत पढ़ने को* तड़पी है यारी आँखें,पिया मिलन की* चाह में अक्सर रोती है सारी आँखें। सुधबुध खोकर जीता जिसने प्रीत का* रास्ता अपनायाप्रेम संदेशा पहुँचाये* वो जन – जन तक प्यारी आँखें। कठिन डगर पनघट की जिसने समझा अक्सर दूर रहाहै* लक्ष्य भेदने में सक्षम

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नज़र आता है

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नज़र आता है हर अक्स यहाँ बेज़ार नज़र आता है,हर शख्स यहां लाचार नज़र आता है। जीने की आस लिए हर आदमी अब,मौत का करता इंतजार नज़र आता है। काम की तलाश में भटकता रोज यहाँहर युवा ही बेरोजगार नज़र आता है। छाप अँगूठा जब कुर्सी पर बैठा तब,पढ़ना लिखना बेकार नज़र आता है। भूखे

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दुख दर्द सभी के हर लें वो माता शेरावाली

विरह और दर्द

दुख दर्द सभी के हर लें वो माता शेरावाली दुख दर्द सभी के हर लें वो माता शेरावाली,झोली सबकी तु भर दे वो माता मेहरावाली,नौ दिन का ये त्योहार लगे बडा ही प्यारा,तुमसे सबकी मैया नाता बडा ही न्यारा,प्रेम सुधा बरसा दे तु लाल चुनरियाँ वाली,दुख दर्द सभी—————–बडी निराली मैइया दुख सबके हर लेती है,पार

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कब कैसे क्या बोले ?

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कब कैसे क्या बोले ? वाणी एक दुधारू तलवार की तरह है।उचित प्रयोग करे तो अच्छा,नहीं तो बुरा।अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।ज्ञान की बात को सहेजकर रखते है।कब कैसे क्या बोले पता नहीं।जुबान फिसली तो रुका नहीं।मन को शांति बनाकर रखिए।होठों से मुस्कान प्रेम से बोलिए।छोटी सी जीभ,बड़े बड़े कहर ढा दे।लड़ाई झगड़े छोड़के,

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कर्मठता की जीत

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कर्मठता की जीत स्वाभिमान मजबूत है , पोषण का है काज ।बैठ निठल्ला सोचता ,  बना भिखारी आज ॥लाचार अकर्मण्यता , मंगवा रही भीख ।काज बिना कर के करे , कुछ तो उससे सीख ॥आलसी लाचार बने , करे गलत करतूत ।कर्मठता सबसे बड़ी , कर देती मजबूत ॥मिलता है मेहनत से , जब भर

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आओ सब मिल कर संकल्प करें

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आओ सब मिल कर संकल्प करें आओ सब मिल कर संकल्प करें।चैत्र शुक्ल नवमी है कुछ तो, नूतन आज करें।आओ सब मिल कर संकल्प करें॥मर्यादा में रहना सीखें, सागर से बन कर हम सब।हम इस में रहना सिखलाएं, तोड़े कोई इसको जब।मर्यादा के स्वामी की, धारण यह सीख करें।आओ सब मिल कर संकल्प करें॥मात पिता

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हां मै कवि हूं

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हां मै कवि हूं  जीने की राह दिखाता हूं।अपनी लेख से,लोगो को जगाता हूं।हा मै कवि हूं………रूठे मन को मनाता हूं।हास्य कविता लिखकरआम जनों को हसाता हूं।हां मै कवि हूं………कभी प्रकृति सौंदर्य।कभी श्रृंगार रस पर,नारी का वर्णन करता हूं।हां मै कवि हूं………अदम्य पराक्रम ।साहसी वीरता पर,सैनिकों की गाथा लिखता हूं।हां मै कवि हूं………रंग बिरंगी होली

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नमन हे विश्ववन्दनीय महावीर

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नमन हे विश्ववन्दनीय महावीर त्याग और अहिंसा की मूर्ति है महावीर।क्षमा और करूणा का सागर है महावीर।दर्शन ज्ञान चरित्र की ज्योति है महावीर।‘रिखब’का नमन हे विश्ववन्दनीय महावीर!राजा सिद्धारथ के घर जन्में,माता जिसकी त्रिशला रानी।तीर्थंकर प्रभु की याद दिलाने,आई प्यारी महावीर जयन्ति।चैत्रशुक्ल दिन त्रयोदशी आया,कुण्डलपुर नगरी अानंद छाया।दिव्य स्वरूप धरती पर आया,जन्मदिवस का उत्सव मनाया।राजमहल में

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मैं भुंइया अंव

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मैं भुंइया अंव बछर- बछर ले पानी पीएव ,मोर कोरा के सुखला भोगेव,रोवत हे तुंहर महतारी ,मोर लइका मन अब तो चेतव,सब के रासा -बासा मोर संग,मैं जग के सिरजइया अंव।मैं भुंइया अंव, मै भुंइया अंव।मोर कोरा मा उपजेव खेलेव,जिनगी के रद्दा ला गढ़ेव।तुंहर बर मैं हाँसेव रोएंवकुटका -कुटका तन ला करेंव।हिरदे मा पीरा ल

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