प्रकृति और पर्यावरण

प्रकृति की सुंदरता, ऋतुओं के परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सृष्टि के विविध रूपों को दर्शाने वाली कविताएँ इस वर्ग में संकलित हैं।

प्रकृति से प्रेम पर कविता

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता, ,

प्रकृति से प्रेम – रीता प्रधान प्रकृति की सुंदरता पर आधारित रचना

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hasdev jangal

प्रकृति से खिलवाड़ का फल – महदीप जंघेल

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

प्रकृति से खिलवाड़ और अनावश्यक विनाश करने का गंभीर परिणाम हमे भुगतना पड़ेगा। जिसके जिम्मेदार हम स्वयं होंगे।
समय रहते संभल जाएं। प्रकृति बिना मांगे हमे सब कुछ देती है।उनका आदर और सम्मान करें। संरक्षण करें।

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प्रकृति से खिलवाड़/बिगड़ता संतुलन-अशोक शर्मा

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

भौतिकता की होड़ में मानव ने प्रकृति के साथ बहुत छेड़छाड़ की है। अपने विकास की मद में खोया मानव पर्यावरण संतुलन को भूल गया है। इस प्रकार के कृत्यों से ही आज कोरोना जैसी महामारी से मानव जीवन के अस्तित्व खतरे में दिख रहा है।

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मौसम कुछ उदास है- रीता प्रधान

प्रकृति और पर्यावरण

मौसम कुछ उदास है- रीता प्रधान दिलों में जाने क्यों,बाकी न कोई एहसास है।एक भाई को ही दूजे भाई की,जाने क्यों खून की प्यास है।प्रकृति तो उदास बैठी ही थी,अब दिलों का भी मौसम कुछ उदास है। जवानी आते जाने कहां ,चला जाता है बचपन का प्यार।घरवाले ही घरवालों पर,जाने क्यों करते हैं अत्याचार।देख दशा

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अपना जीवन पराया जीवन – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम “

प्रकृति और पर्यावरण

इस रचना में कवि ने जीवन के विभिन्न आयामों की चर्चा की है |इस रचना का विषय है “अपना जीवन पराया जीवन” – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम “

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नारा भर हांकत हन (व्यंग्य रचना)

प्रकृति और पर्यावरण

एकर सेती भैया हो , जम्मो मनखे मन,ला मिलजुल के,लालच ला दुरीहा के पर्यावरण बचाए बर कुछ करना
पड़ही। लेकिन ये हा केवल मुंह अउ किताब भर मा तिरिया जाथे।

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पर्यावरण और मानव/ अशोक शर्मा

प्रकृति और पर्यावरण

पर्यावरण और मानव/ अशोक शर्मा धरा का श्रृंगार देता, चारो ओर पाया जाता,इसकी आगोश में ही, दुनिया ये रहती।धूप छाँव जल नमीं, वायु वृक्ष और जमीं,जीव सहभागिता को, पर्यावरण कहती। पर देखो मूढ़ बुद्धि, नही रही नर सुधि,काट दिए वृक्ष देखो, धरा लगे जलती।कहीं सूखा तूफ़ां कहीं, प्रकृति बीमार रही,मही पर मानवता, बाढ़ में है

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क्यों काट रहे हो जंगल -बिसेन कुमार यादव’बिसु’ (वन बचाओ आधारित कविता)

प्रकृति और पर्यावरण

क्यों काट रहे हो जंगल (वन बचाओ आधारित कविता) क्यों कर रहे हो अहित अमंगल!क्यों काट रहे हो तुम जंगल!! धरती की हरियाली को तूने लूटा!बताओ कितने जंगल को तूने काटा!! वनों में अब न गुलमोहर न गूलर खड़ी है!हरी-भरी धरती हमारी बंजर पड़ी है!! अगर ये जंगल नहीं रहा तो, कजरी की गीत कहां

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प्यार से दुश्मनी को मिटा दंगे हम-अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

प्रकृति और पर्यावरण

इस कविता के माध्यम से कवि दुनिया से दुश्मनी को ख़त्म करना चाहता है और मुहब्बत से रहने को प्रेरित कर रहा है |
प्यार से दुश्मनी को मिटा दंगे हम– कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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चन्द्र स्तुति- अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

प्रकृति और पर्यावरण

इस रचना में चंद्रदेव भगवान् की स्तुति की गयी है |
सोम स्तुति ( चन्द्र स्तुति ) – वंदना – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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