समाज और यथार्थ

अपने लिये जीना (अदम्य चाह)-शैली

समाज और यथार्थ

“अदम्य चाह”, शीर्षक की कविता, एक मध्यमवर्ग की भारतीय स्त्री की दिली हसरत है। बेटी जन्म से बंधनों में रहती है, परिवार, समाज के सैकड़ों पहरे और प्रश्न झेलती है, शादी के बाद तो पहरे और भी बढ़ जाते हैं। मेरा स्वयं का मन एक स्वच्छंद जीवन के लिए तरसता है, मुझे लगता है कि मैने स्त्री मात्र की हार्दिक इच्छा को शब्द दिये हैं.

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widow

विधवा पर कविता

समाज और यथार्थ

मैंने अपनी स्वरचित कविता “विधवाएं” कुछ समय पहले ही लिखी है ,और इसे लिखने के लिए प्रेरणा भी मुझे यथार्थ ही मिली। कि हम चाहे कितनी ही तरक्की क्यूं न कर ले मगर हमारी सोच औरतों को लेकर अब भी संकीर्ण ही है।

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बाल भिक्षु पर कविता

समाज और यथार्थ

दर्द न जाने कोय….. बाल भिक्षु पर कविता(विधाता छंद मुक्तक) झुकी पलकें निहारें ये,रुपैये को प्रदाता को।जुबानें बन्द दोनो की,करें यों याद माता को। अनाथों ने, भिखारी नें,तुम्हारा क्या बिगाड़ा है,दया आती नहीं देखो,निठुर देवों विधाता को। बना लाचार जीवन को,अकेला छोड़ कर इनको।गये माँ बाप जाने क्यों,गरीबी खा गई जिनको। सुने अब कौन जो

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उपन्यास गांधी चौक ‘ जैसा मेंने समझा

समाज और यथार्थ

हिन्दी के नवांकुर लेखक डा. आनंद कश्यप का प्रथम उपन्यास ” गांधी चौक ” केवल एक कहानी नहीं है. बल्कि छत्तीसगढ़ के संघर्षरत युवाओं की यथास्थिति का यथार्थ चित्रण है. चूंकि लेखक स्वयं एक प्रतियोगी हैं, तो उपन्यास में उन्होंने भावों के साथ अपनी आत्मा भी पिरो दी है.

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संस्कारों की करते खेती

समाज और यथार्थ

संस्कारों की करते खेती बीज रोप दे बंजर में कुछ,यूँ कोई होंश नहीं खोता।जन्म जात बातें जन सीखे,वस्त्र कुल्हाड़ी से कब धोता। संस्कृति अपनी गौरवशाली,संस्कारों की करते खेती।क्यों हम उनकी नकल उतारें,जिनकी संस्कृति अभी पिछेती।जब जब अपने फसल पकी थी,पश्चिम रहा खेत ही बोता।बीज रोप दे बंजर में कुछ,यूँ कोई होंश नही खोता। देश हमारा

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विधाता छंद में प्रार्थना

समाज और यथार्थ

विधाता छंद में प्रार्थना विधाता छंद१२२२ १२२२, १२२२ १२२२. प्रार्थना.सुनो ईश्वर यही विनती,यही अरमान परमात्मा।मनुजता भाव मुझ में हों,बनूँ मानव सुजन आत्मा।.रहूँ पथ सत्य पर चलता,सदा आतम उजाले हो।करूँ इंसान की सेवा,इरादे भी निराले हो।.गरीबों को सतत ऊँचा,उठाकर मान दे देना।यतीमों की करो रक्षा,भले अरमान दे देना।.प्रभो संसार की बाधा,भले मुझको सभी देना।रखो ऐसी कृपा

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हम तुम दोनों मिल जाएँ

समाज और यथार्थ,

हम तुम दोनों मिल जाएँ मुक्तक (१६मात्रिक) हम-तुम हम तुम मिल नव साज सजाएँ,आओ अपना देश बनाएँ।अधिकारों की होड़ छोड़ दें,कर्तव्यों की होड़ लगाएँ। हम तुम मिलें समाज सुधारें,रीत प्रीत के गीत बघारें।छोड़ कुरीति कुचालें सारी,आओ नया समाज सँवारें। हम तुम मिल नवरस में गाएँ,गीत नए नव पौध लगाएँ।ढहते भले पुराने बरगद,हम तुम मिल नव

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भारतीय वायु सेना के सम्मान में कविता

समाज और यथार्थ,

भारतीय वायु सेना के सम्मान में कविता भारतीय वायु सेना के जवानों के,सम्मान में सादर समर्पित छंद,. (३०मात्रिक (ताटंक) मुक्तक) मेरे उड़ते…… ….. बाजों काचिड़ीमार मत काँव काँव कर,काले काग रिवाजों के।वरना हत्थे चढ़ जाएगा,मेरे उड़ते बाज़ों के।बुज़दिल दहशतगर्दो सुनलो,देख थपेड़ा ऐसा भी।और धमाके क्या झेलोगे,मेरे यान मिराजों के। तू जलता पागल उन्मादी,देख भारती साजों

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save tree save earth

पर्यावरण असंतुलन पर कविता

समाज और यथार्थ

आज पर्यावरण असंतुलन हो चुका है . पर्यावरण को सुधारने हेतु पूरा विश्व रास्ता निकाल रहा हैं। लोगों में पर्यावरण जागरूकता को जगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा संचालित विश्व पर्यावरण दिवस दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक आयोजन है। इसका मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे विभिन्न

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