नोहर होगे / डॉ विजय कन्नौजे

छत्तीसगढ़ कविता

नोहर होगे / डॉ विजय कन्नौजे

छत्तीसगढ़ कविता
छत्तीसगढ़ कविता

नोहर होगे बटकी मा बासी
बारा में राहय नुन।
तिवरा के बटकर, बेलि नार
के राहय सुघ्घर मुंग।।

तिवरा नि बाचिस संगी
गरवा के चरई मा।
नेवता हावय तुमन ला
मोर गांव के मड़ई मा।।

घातेच सुघ्घर लागथे
मोर गांव के मड़ई।
अड़बड़ मजा आथे संगी
राऊत‌ मन के लड़ई।

दोहा पारथे लाठी चालथे
झुमर झुमर के नाच।
जुरमिल के राऊत नाचा
ढोल धमाका रथे बाज।।

तिवरा बटकर गोलइंदा भाटा
नोहर होगे अमटाहा साग।
तीन दिन के तिआसी बासी
अब तो झन कर इकर मांग।।

चिरपोटी पताल के चटनी
पनपुरवा,अंगाकर रोटी।
अब नोहर होगे संगवारी हो
धोवा धोवा मर्दाना धोती।।

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