कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

अच्छी आध्यात्मिकता ही अच्छी अर्थव्यवस्था है

हिंदी कविता

“अच्छी आध्यात्मिकता ही अच्छी अर्थव्यवस्था है” किसी वस्तु की क़ीमतउसके दाम से नहीं,उस असर से तय होती हैजो वहमन पर छोड़ती है। हम बाहर की चीज़ों सेभीतर की तृप्तिखोजते हैं। पर जबआत्म-बोध नहीं होता,तोमूल्य और मूल्यांकनअलग हो जाते हैं। यहीं सेव्यक्तिगत दुखऔरसामूहिक बर्बादीशुरू होती है। अर्थव्यवस्थाआख़िर है किसके लिए?मनुष्य के लिए। और मनुष्य का कल्याणक्या

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समस्या तकनीक नहीं, तुम हो

हिंदी कविता

“समस्या तकनीक नहीं, तुम हो” तकनीकन निर्दोष है,न अपराधी—वहबस औज़ार है। विनाशखरीदने वाले में है। अंधा उपभोगधरती को नहीं,पहलेमन कोखोखला करता है। और जब तकउपभोक्ताजागता नहीं,खपतरुक नहीं सकती। उपभोक्तासिर्फ़पैसा रखने वाला नहीं,उपभोक्ताअहंकार है—जोखुद को भरनेनिकला है। कानूनप्रगति कोनहीं रोक सकते। जिज्ञासामानव स्वभाव है—हमआगे बढ़ेंगे,खोजेंगे,तोड़ेंगे,बनाएँगे। यह ठीक है। गलती यह हैकि हमारी जिज्ञासाबाहर जाती है,भीतर नहीं।

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एक-दूसरे की ओर नहीं, ऊपर की ओर

हिंदी कविता

“एक-दूसरे की ओर नहीं, ऊपर की ओर” संबंध काएक ही सवाल है—वह तुम्हेंउसकी ओर खींचता है,यातुम्हारी ऊँचाई की ओर? अगर उसकी मौजूदगी मेंतुमउसके मूड केचक्कर काटते हो,उसकी स्वीकृति केइंतज़ार में रहते हो—तो वह प्रेम नहीं,आश्रितता है। जो तुम्हेंअपनी पहली प्राथमिकताबनाना चाहता है,पर तुम्हारेविकास की चिंता नहीं करता—वहसाथी नहीं,केंद्र बनना चाहता है। साधारण प्रेम मेंएक चुप

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“पशु होकर जन्म, पर उठने के लिए बने

हिंदी कविता

“पशु होकर जन्म, पर उठने के लिए बने” शरीरपशु से मिलता है—भूख,डर,संरक्षण की चाह। यह स्वाभाविक है। पर मन भीअगरयहीं अटक जाए—तो प्रश्न उठता है। पशुईर्ष्या करता है—इलाका बचाने के लिए। पशुधोखा देता है—जीने के लिए। पशुहिंसा करता है—खतरे में। यह जंगल का नियम है। अब अपने भीतर देखो—क्यारोज़ी कमाने के लिएईर्ष्या ज़रूरी है? क्यासाँस

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पवित्र असंतोष”

हिंदी कविता

पवित्र असंतोष” जीवन एक है—इसलिएठहरना अपराध है। हम हालात सेसमझौता कर लेते हैं,क्योंकि वेपहचाने हुए होते हैं,सही इसलिए नहीं। जहाँ गिरा दिया गया,वहींघर बना लिया। लोग कहते हैं—तनाव है,व्यवस्था खराब है,दुनिया कठिन है। पर भीतरएक आराम छुपा है—गलत जीवन काआराम। दुख है,पर जाना नहीं चाहते। सच्चा असंतोषशिकायत नहीं करता,वहरूपांतरण माँगता है। वह कहता है—यह जीवनमेरी

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“हर अपराध चीखता नहीं”

हिंदी कविता

“हर अपराध चीखता नहीं” हर अपराधअख़बार में नहीं आता,कुछरोज़मर्रा की हवा मेंघुलकरऔरत की साँसों में उतर जाते हैं। शादी के बादकाम करने की मनाही—कोई शोर नहीं। दफ़्तर मेंछेड़छाड़—“चलता है” कहकरफाइल बंद। प्रसव में मौत—एक आँकड़ा। रात की सड़क—उसके लिए नहीं। उसका शरीर—उसकी पहचान।तालियाँ बजती हैं। नेतृत्व में उसकी कमी—किसे फ़ुर्सत है सोचने की? फिर एक

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“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना”

हिंदी कविता

“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना” दुनिया बीमार है—यह कोई खबर नहीं,यह पृष्ठभूमि है।अख़बार, स्क्रीन, बाज़ार,तालियाँ, नारे,सब एक ही ज्वर में काँपते हैं। हर तरफ़महत्वाकांक्षा की खाँसी,ईर्ष्या का बुख़ार,लालच की उलटी,और इसे“सफलता” कहा जाता है। जो तुम देखते हो,वही तुम बनते हो।जो तुम्हारा समय खाता है,वही तुम्हें निगलता है।जो मन में बैठ जाता है,वही मालिक हो

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“असुरक्षा की गोद में गपशप”

हिंदी कविता

“असुरक्षा की गोद में गपशप” गपशपएक आग हैजिसमें सच नहीं जलता,डर सुलगता है।दो लोग फुसफुसाते हैं—तीसरा जुड़ जाता है,फिर चौथा,फिर भीड़।कोई सवाल नहीं पूछता—क्यों?किसलिए?यहाँ जुड़ावअर्थ से नहीं बनता,शोर से बनता है।मैं भी बोल दूँकुछ भी—तो मैं भी हूँ।मैं भी अपना हूँ।यही प्रमाण हैइस झूठे परिवार का।सन्नाटा डराता है,क्योंकि सन्नाटे मेंमैं हूँ—नंगा,अकेला,बिना सहारे।इसलिए लोगशब्द उछालते हैंजैसे

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बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना

हिंदी कविता

बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना याद रखो—जिसे तुम देखते हो,जिसे तुम पूजते हो,जिसे तुम समय देते हो,अंततःतुम वही बन जाते हो। यह दुनियाबीमारी से अछूती नहीं है।समाचार बीमार हैं,बाज़ार बीमार हैं,मनोरंजन बीमार है,शिक्षा बीमार है,सत्ता बीमार है। यहाँ पीड़ाअपवाद नहीं,पृष्ठभूमि है—हर दिन कीलगातार बजती आवाज़। टीवी खोलो—क्या दिखता है?गहराई?शांति?बोध? नहीं।वही दौड़,वही लालच,वही असुरक्षा,वही तुलना,वही ईर्ष्या—हज़ार

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असुरक्षा का परिवार

हिंदी कविता

असुरक्षा का परिवार गपशपसच का संवाद नहीं,डर की साझेदारी है। कुछ लोग बैठते हैं,शब्द नहीं—खालीपन बाँटते हैं।और अचानकभीड़ बन जाती है। कौन जोड़ता है उन्हें?न विचार,न विवेक,न सत्य—बसनिरर्थकता की गर्माहट। डर अकेले रहने का है,इसलिएशोर में घुल जाते हैं।जो स्वयं से अनजान हैं,वेएक-दूसरे का सहारा बनते हैं। वर्मा भी बोलता है,शर्मा भी,चोपड़ा भी—सब वही।तो मैं

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(मरने से पहले जागो)

हिंदी कविता

Wake Up before You Die(मरने से पहले जागो)(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, अतुकांत कविता) हर साँस के साथकुछ जोड़ो मत—कुछ गिराओ। दिन बीतेंतो बोझ बढ़े नहीं,हल्कापन गहरा हो। जीवन का उद्देश्यसंग्रह नहीं है,समझ है। जानकारी नहीं,दृष्टि बढ़नी चाहिए।संपत्ति नहीं,स्वतंत्रता। सच्ची वृद्धिपाने में नहीं,छोड़ने में है। भ्रम छोड़ो,उधार के सपने छोड़ो,उस झूठे “मैं” को छोड़ोजिसे तुमखुद समझ बैठे हो।

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सामूहिक मूर्खता की ताक़त

हिंदी कविता

सामूहिक मूर्खता की ताक़त(अतुकांत कविता) जब सचमतों से तय होने लगे,समझ लोसच हार चुका है। एक मूर्खहँसी बनता है,लाख मूर्खइतिहास। भीड़गलत कोसही बना देती है,और सही कोख़तरा। झूठअकेला नहीं चलता—वहनारे चाहता है,झंडे चाहता है,तालियाँ चाहता है। सचचुप रहता है,अकेला खड़ा रहता है—बिना मंच,बिना समर्थन। आजमूर्खतागलती नहीं रही,संस्था बन गई है। अबप्रश्न पूछनाअपराध है,सोचनादेशद्रोह। भीड़ कहे—तो

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