कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो

हिंदी कविता

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो कोई कमजोर नहीं है।हम बस नाटक करते हैं। सुविधा के लिए टूटते हैं।रीढ़ बेचते हैं।और कहते हैं—“ठीक है, मैं ऐसा ही हूँ।” हम सजाते हैं अपनी कमजोरी।तर्क बनाते हैं।सद्गुणों में बदल देते हैं। पर सच यही है—जिसे तुम सहते रहो,वह बढ़ता है। कमजोर स्व को तिरस्कार दो।उसे पालना बंद

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो Read More »

बढ़ो, केवल चमको मत

हिंदी कविता

बढ़ो, केवल चमको मत खुद में निवेश करो।दिखावे में नहीं। ईंधन भरो—ज्ञान, कर्म, साधना की।ना कि चमकते आभूषणों की। हीरे जड़ दो डैशबोर्ड में,सोने की हँसी लगाओ दरवाजों पर,पर इंजन को मत भूलो।वरना रॉयल दिखोगे,पर कहीं नहीं पहुँचोगे। समय, ऊर्जा, ध्यान—यह असली इंजन है।छोटे झूठे आभूषणरुकावट बन जाते हैं। वह व्यक्ति जो नई घड़ी पहनता

बढ़ो, केवल चमको मत Read More »

कोई विश्वास पवित्र नहीं

हिंदी कविता

कोई विश्वास पवित्र नहीं मैंने देखा एक रोगी—खुलकर बोला, “दवा नहीं चाहिए,मुझे अपनी बीमारी प्यारी है।”कम से कम वह अपने पागलपन में ईमानदार था। पर अधिक खतरनाक है वह,जो मान लेता है कि बीमार है,फिर झूठी दवा थाम लेता है,और मुस्कुराता है,जैसे वह ठीक हो रहा हो।वह न केवल बीमार है,बल्कि चालाक भी है।और उसकी

कोई विश्वास पवित्र नहीं Read More »

घाव को सहलाना बंद करो

हिंदी कविता

घाव को सहलाना बंद करो घाव जिसे हर रोज़ सहलाया गया,वह कभी नहीं सीखा खड़ा होना।थोड़ी-सी चोट, थोड़ी-सी आलोचना—और हम उसे तकिया, आईना, मरहम दे आए। “कोई बात नहीं, तुम बहुत संवेदनशील हो,”“दुनिया ही ऐसी है”—इन शब्दों से घाव गहरा होता गया,अहंकार मजबूत, पैर कमजोर। क्यों हम नाज़ुकता को प्यार समझ बैठे?क्यों हर आहत को

घाव को सहलाना बंद करो Read More »

पीड़ित होने का खेल

हिंदी कविता

पीड़ित होने का खेल अहंकारदो भाषाएँ जानता है—अच्छा हुआ तो“मैंने किया”,बुरा हुआ तो“मेरे साथ हुआ।” सफलताउसकी पहचान बन जाए,ऐसा कम ही होता है,इसलिए वहदोष को हीअपनी ढाल बना लेता है। हर चोट के पीछेकोई और होता है—आज वह,कल यह,और हर बारमैं पीड़ित। दयाउसकी प्रिय मुद्रा है,क्योंकि दया मेंबदलाव की माँग नहीं होती। समाधानकठिन है,उसमें स्वयं

पीड़ित होने का खेल Read More »

सबसे ख़तरनाक घाव

हिंदी कविता

सबसे ख़तरनाक घाव कोई भीजानबूझकरखुद को नहीं तोड़ता।हम जो भी करते हैं,राहत के नाम पर करते हैं,खुशी के भ्रम में,भागने की चाह में। हम कहते हैं—यह प्रेम है,यह स्वतंत्रता है,यह उपचार है।पर अज्ञाननए नाम पहन लेता है। खुद को चोट पहुँचानाकेवल दवाइयों या धारदार चीज़ों से नहीं होता।यह तब भी होता हैजब हम ज़हर कोआत्मा

सबसे ख़तरनाक घाव Read More »

अपनी ही जेब से चोरी

समाज और यथार्थ

अपनी ही जेब से चोरी हम चोरी तब पहचानते हैंजब उँगलियाँकिसी और की जेब में जाती हैं। पर जबमैं अपने ही सपनों कोचुपचाप गिरवी रख देता हूँ,जबमैं अपनी ऊँचाई सेखुद ही मुँह मोड़ लेता हूँ—तब कोई शोर नहीं होता। मैं खुद से झूठ बोलता हूँ,फिर उसी झूठ कोसच की तरहओढ़ लेता हूँ। दूसरों को धोखाकुछ

अपनी ही जेब से चोरी Read More »

अपने भीतर की शरारत पकड़ना

हिंदी कविता

अपने भीतर की शरारत पकड़ना अपने ही भीतररंगे हाथों पकड़ लेना—इससे बड़ा मज़ाऔर क्या होगा? जब मनबिना पूछेकल्पनाओं में फिसलने लगे,तभी उसे पकड़ो। जब डरधीरे से कंधे परहाथ रखे,या असुरक्षाकान में फुसफुसाए—उसी क्षणरोशनी जला दो। ये सबअँधेरे के जीव हैं,ध्यान की एक किरणपड़ते हीसिकुड़ने लगते हैं। ईर्ष्या,चिंता,बिखरे विचार—इन्हें सुधारो मत,बस देखो। देखते हीइनकी पकड़ढीली पड़

अपने भीतर की शरारत पकड़ना Read More »

नींद में चलता जीवन

हिंदी कविता

नींद में चलता जीवन कक्षा छठी मेंतुमसे कहा गया—पढ़ो,ताकि घर वालों कोपड़ोस में गर्व मिल सके। इनाम रखे गए—खिलौने,मुस्कानें,तुलनाएँ। फिर कक्षा दस आई—अंकों का डर,भविष्य का शोर। कक्षा बारह—और गहरी थकान,और बड़ा भय। तुम झुके,तुम दौड़े,तुमने रटा—पर कभी नहीं पूछाकि क्यों। अब कहानी बदली नहीं,बस संख्या बदल गई।अंक से तनख़्वाह,तनख़्वाह से पद,पद से प्रोफ़ाइल। लिंक्डइन

नींद में चलता जीवन Read More »

ज़िंदगी ही आईना

समाज और यथार्थ

ज़िंदगी ही आईना हम भागते रहते हैं,इतनी तेज़ी सेकि अपनी ही परछाईंपीछे छूट जाती है। शोर में जीते हुएहमने चुप्पी सेआँख मिलाना छोड़ दिया।क्योंकि चुप्पीसवाल पूछती है। रुको—और देखो,तुम असल में कर क्या रहे हो?किस डर ने तुम्हेंइतना व्यस्त बना रखा है? क्यों अकेलेपन कीहल्की-सी आहटतुम्हें बेचैन कर देती है?क्यों भविष्यउम्मीद और डर के बीचझूलता

ज़िंदगी ही आईना Read More »

खुद से प्यार

हिंदी कविता

खुद से प्यार सचकोई मुलायम तकिया नहीं होता,वह काँटा है—जो भीतर धँसकरहमें जगाता है। दुनिया को बोलने दो।वे मेरे कपड़ों पर बोलेंगे,मेरी त्वचा पर,मेरी आवाज़ पर।ये सतह की बातें हैं—हवा की तरह आती-जाती। पर जहाँ मेरी असली कीमत रहती है,वहाँ किसी का प्रवेश नहीं।न भीड़ का,न अपनों का।वह जगह पवित्र है,और उसकी रखवालीमुझे खुद करनी

खुद से प्यार Read More »

स्वयं को देखना

हिंदी कविता

स्वयं को देखना खुद को जानने के लिएमैंने प्रश्न नहीं पूछे,मैंने अपने दिन देखे। घड़ी की सुइयों ने बतायामेरा समय कहाँ गिरता है,और रात ने बतायामेरा मन किसके पास भटकता है। मैंने अपने शब्द नहीं गिने,अपने कदम गिने—वे बार-बारउसी दिशा में जाते रहेजिसे मैं स्वीकार नहीं करता था। मैं बोला—मैं न्याय चाहता हूँ,मैं शांति चाहता

स्वयं को देखना Read More »

Scroll to Top