कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

mahatma gandhi

वन्दे मातरम् गाऊँगा

हिंदी कविता

वन्दे मातरम् गाऊँगा बापू जी के चरखे को,मैं भी खूब घुमाऊँगा।सत्य-अहिंसा की बातें,सबको रोज सुनाऊँगा।। चाचा जी के लाल ग़ुलाब,बाग़-बगीचे में लगाउँगा।शीश झुकाकर चरणों में,लाल ग़ुलाब चढ़ाऊँगा।। पर्वत-घाटी ऊँचा चढ़कर,तिरंगा ध्वज फहराउंगा।चाहे दुनिया जो भी करले,    वन्देमातरम् गाऊँगा।।     ||स्वरचित||उमेश श्रीवास”सरल”मु.पो.+थाना-अमलीपदरविकासखण्ड-मैनपुरजिला-गरियाबंद,छत्तीसगढ़

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mahatma gandhi

बापू पर कविता

हिंदी कविता

बापू पर कविता भारत ने थी पहन ली, गुलामियत जंजीर।थी  अंग्रेज़ी  क्रूरता, मरे   वतन  के   वीर।। काले पानी  की सजा, फाँसी हाँसी खेल।गोली  गाली  बरसते, भर  देते  थे  जेल।। याद करे जब देश वह, जलियाँवाला बाग।कायर  डायर  क्रूर  ने, खेला  खूनी फाग।। मोहन, मोहन  दास बन, मानो  जन्मे  देश।पढ़लिख बने वकीलजी,गुजराती परिवेश।। देखे  मोहन दास 

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वाणी वन्दना

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वाणी वन्दना    निर्मल करके तन_ मन सारा,   सकल विकार मिटा दो माँ,    बुरा न कहे माँ किसी को भी    विनय यह स्वीकारो  माँ।      अन्दर  ऐसी ज्योति जगाओ      हर  जन का   उपकार करें,       मुझसे यदि त्रुटि कुछ हो जाय       उनसे मुक्ति दिलाओ  माँ।        प्रज्ञा  रूपी किरण पुँज तुम        हम तो निपट  अज्ञानी है,         हर दो

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बोझ पर कविता

हिंदी कविता

बोझ पर कविता कभी कभीकलम भी बोझ लगने लगती हैजब शब्द नहीं देते साथअंतरभावों काउमड़ती पीड़ायें दफन हो जातीभीतर कहींउबलता है कुछधधकता हैज्वालामुखी सीविचारों के बवंडरभूकंप सा कंपाते हैमन मस्तिष्क कोऔर सारे तत्वों के बावजूदमन अकेला हो जाता हैउस माँ की तरहजो नौ महीने सहर्षभार ढोती ।उस पिता की तरहजो कंधे और झुकती कमर तकजिम्मेदारी

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जीवनामृत मेरे श्याम

हिंदी कविता

जीवनामृत  मेरे   श्याम :   — अमृत  कहाँ  ले  पाबे रे  मंथन  करे बगैर ।सद्ज्ञान नई मिले तोला साधन करे बगैर ।। मन  मंदराचल  बना ले  हिरदे  समुंद  कर ,मन  नई बँधावे  देख ले  बंधन करे बगैर ।। गुन  दोष  के सुतरी  ल बने  बांध  खिंच के ,मथ  रात दिन आठो पहर खंडन करे बगैर ।।

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त्रिपदिक

हिंदी कविता

त्रिपदिक      .    अतीत   धरोहर   है ।सुधार  ले  चल  आज  कोतुझे  आता  जौहर   है ।            *जीवन रण हारा अगर ।मत हो निराश बाँकुरेदेगी विजय मंत्र समर ।           *कविता नहीं बोल रहा ।आप बीती है मेरीभेद ये क्यों खोल रहा ।                *कर्म में प्रेम धर्म कर ।समृद्धि घर आती हैबंदे सदा सुकर्म कर ।     .              *क्यों 

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हिन्दी की बिंदी में शान

हिंदी कविता

हिन्दी की बिंदी में शान हिन्दी भाषा की बिंदी  में शान।तिरंगे के गौरव गाथा की आन।।राजभाषा का ये पाती सम्मान।राष्ट्रभाषा से मेरा भारत महान ।। संस्कृत के मस्तक पर चमके।सिंधी,पंजाबी चुनरी में दमके।।बांग्ला,कोंकणी संग में थिरके।राजस्थानी चूड़ियों में खनके ।। लिपि देवनागरी रखती ध्यान।स्वर व्यंजन में है इसकी शान।।मात्राओं का हमें कराती ज्ञान।शब्द भंडार है

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आज का भारत -आर्द्रा छंद

हिंदी कविता

        आज का भारत  हवा  चली  है  अब  देश  में  जो         विकास  गंगा  बहती  मिली  है ।आनंद   वर्षा   चहुँ  ओर   होती        तरंग  से  आज  कली खिली है ।। गरीब   कोई   मिलता   नहीं   है        बेरोजगारी    अब     दूर   भागे ।संसाधनों  की  कमियाँ  नहीं  है         रिकार्ड  उत्पादन  और  आगे ।। बना   रहा   भारत   आशियाना         है  चाँद की भूमि निहाल

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बसंत बहार

हिंदी कविता

बसंत बहार शरद फुहार जाने लगीबसंती बहार आने लगी !कोयल की कूक गुंजे चहुँ ओरधीरे – धीरे धूप तेज कदम नेंबाग में आम बौराने लगी! शाम ढ़ले चहचहाते पक्षियोंघोसला को लौटने झुंड में,पेड़ों को पत्ते पीला होकरएक – एक कर झड़ने लगी!खेत खलिहान मे पुआलगाय बकरी सुबह शाम तकनिश्चिंत हो चरने लगी! आया बसंत बहारलाया

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भोर का दिनकर

हिंदी कविता

” भोर का दिनकर “ पश्चिम के सूर्य की तरहदुनियाँ भी ….मुझे झूठी लगीमानवता काएक भी पदचिन्हअब तो दिखाई नहीं देताजागती आँखों केसपनों की तरहअन्तःस्थल कीभावनाएँ भीखण्डित होती हैंतब ..जीवन काकोई मधुर गानसुनाई नहीं देताफिर भी ….सफेदपोश चेहरों कोबेनकाब करते हुएएक नई उम्मीद कादमखम भरते हुएसुनहले फसलों कोप्राणदान देते हुएइस विश्वरूपी भुवन की ओरधीमे कदमों

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लकड़ियों पर कविता

हिंदी कविता

लकड़ियों पर कविता              चिता की लकड़ियाँ,ठहाके लगा रही थीं,शक्तिशाली मानव को,निःशब्द जला रही थीं!मैं सिसकती रही,जब तू सताता था,कुल्हाड़ी लिए हाथ में,ताकत पर इतराता था!भूल जाता बचपन में,खिलौना बन रिझाती रही,थक जाता जब खेलकर,पालने में झुलाती रही!देख समय का चक्र,कैसे बदलता है,जो जलाता है वो,कभी खुद जलता है!मेरी चेतावनी है,अब मुझे पलने दे,पुष्पित,पल्लवित,होकर फलने

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बोल रहे पाषाण

हिंदी कविता

बोल रहे पाषाण बोल रहे पाषाण अबव्यक्ति खड़ा मौन है,छोड़ा खुद को तराशनापत्थरों पर ही जोर है।कभी घर की दीवारेंकभी आँगन-गलियारे,रखना खुद को सजाकररंग -रौगन का दौर है।घर के महंगे शो पीसबुलाते चारों ओर हैं  ,मनुज को समय नहींअब चुप्पी का दौर है।दिखावे की है दुनियाकलाकारी सब ओर है,असली चेहरा छुपा लेनाअब मुखौटों का दौर

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