कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

Jai Sri Ram kavitabahar

राम को खेलावत कौशिल्या रानी / बाबूराम सिंह

हिंदी कविता

राम को खेलावत कौशिल्या रानी / बाबूराम सिंह चैत शुक्ल नवमी को पावन अयोध्या में ,मध्य दिवस प्रगटाये रामचनद्र ज्ञानी।सुन्दर सुकोमल दशरथ नृपति -सुत ,भव्यसुख शान्ति सत्य सिन्धुछवि खानी।जिनके दर्शन हेतु तरसता सर्व देव ,बाल ब्रह्मचारी संत योगी यती ध्यानी।शुचि उत्संग बिच ले के “कवि बाबूराम “श्रीहरि राम को खेलावत कौशिल्या रानी। ललाटे तिलकभाल ग्रीवा […]

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दहेज प्रथा अभिशाप है – बाबूराम सिंह

हिंदी कविता

दहेज प्रथा अभिशाप है दानव क्रूर दहेज अहा ! महा बुरा है पाप ।जन्म-जीवन नर्क बने,मत लो यह अभिशाप।।पुत्रीयों के जीवन में ,लगा दिया है आग।खाक जगत में कर रहा,आपस का अनुराग।। जलती हैं नित बेटियाँ ,देखो आँखें खोल।तहस-नहस सब कर दिया,जीवन डांवाडोल।।पुत्री बिना सम्भव नहीं ,सृष्टि सरस श्रृंगार ।होकर सब कोइ एकजुट,इसपर करो विचार।।

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हिन्दी का गुणगान – अकिल खान

समाज और यथार्थ

हिन्दी का गुणगान संस्कृत भाषा से,अवतरित हुआ है हिन्दी,भारत की माथे की है ये अनमोल बिन्दी।‘राष्ट्रीय भाषा’का जिसे मिला है देश मे सम्मान,प्यारे देशवासियों किजीए,हिन्दी का गुणगान। हिन्दी की है प्यारी-प्यारी,मिठी-मिठी बोली,दोस्ती-व्यवहार में,हिन्दी भाषा है हमजोली।विद्वान-ज्ञानीयों ने,जिसका किया है बखान,प्यारे देशवासियों,किजीए हिन्दी का गुणगान। हम हैं हिन्दवासी,हमें नित हिन्दी है प्यारा,हिन्दी को सभी-जन ने प्यार

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सलिल हिंदी – डाॅ ओमकार साहू

हिंदी कविता

सलिल हिंदी (सरसी छंद) *स्वर व्यंजन के मेल सुहाने, संधि सुमन के हार।**रस छंदों से सज धज आई, हिंदी कर श्रृंगार..* वर्णों का उच्चारण करतें, कसरत मुख की जान।मूर्धा जिह्वा कंठ अधर सह, दंतो से पहचान।ध्वनियों को आधार बनाकर, करते भेद सुजान।*भाव सहित संदर्भ समाहित, सहज शील संचार…**रस छंदों से सज धज आई, हिंदी कर

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हिंदी का पासा – उपेन्द्र सक्सेना

हिंदी कविता

पलट गया हिंदी का पासा गीत-उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट हिंदी बनी राजभाषा ही, लेकिन नहीं राष्ट्र की भाषाक्षेत्रवाद के चक्कर में ही, पूरी हो न सकी अभिलाषा। पूर्वोत्तर के साथ मिले जब, दक्षिण के भी लोग यहाँ परहिंदी का विरोध कर जैसे, जला रहे हों अपना ही घरहिंदी की सेवा में जिसको, देखा गया यहाँ पर

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परवाह करने वाले – विनोद सिल्ला

हिंदी कविता

परवाह करने वाले होते हैं कम हीपरवाह करने वालेहोता है हर एक इस्तेमाल करने वाला वास्तव मेंपरवाह करने वालेइस्तेमाल नहीं करतेवहीं इस्तेमाल करने वालेपरवाह नहीं करते पहचानिएकौन हैं परवाह करने वालेकौन हैं इस्तेमाल करने वाले होते हैं विरले हीपरवाह करने वालेउनकी परवाह अवश्य करें । -विनोद सिल्ला

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श्रीराम पर कविता – बाबूराम सिंह

हिंदी कविता

कविता भक्त वत्सल भगवान श्रीराम —————————————– सूर्यवंशी सूर्यकेअवलोकि सुचरित्र -चित्र,तन – मन रोमांच हो अश्रु बही जात है।सुखद- सलोना शुभ सदगुण दाता प्रभु ,नाम लेत सदा भक्त बस में हो जातहैं। नाम सीताराम सुखधाम पतित -पावन ,पाप-ताप आपो आप पलमें जरि जात है ।पामर ,पतित अरू पातकी अघोर हेतु ,सेतु बनी तार बैकुण्ठ को ले

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सुफल बनालो जन्म कृष्णनाम गायके – बाबूराम सिंह

हिंदी कविता

सुफल बनालो जन्म कृष्णनाम गायके कृष्ण सुखधाम नाम परम पुनीत पावन ,पतित उध्दार में भी प्यार दिखलाय के।कर की मुरलिया से मोहे त्रिलोक जब ,सुफल बना लो जन्म कृष्ण नाम गाय के। चौदह भुवन ब्रह्मांण्ड त्रिलोक सारा ,पालन संहार सृष्टि छन में रचाय के ।कलिमल त्रास से उदास आज जन-जन ,वेंणु स्वर फूंक फिर भारत

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जीवन पर कविता – नीरामणी श्रीवास

हिंदी कविता

सिंहावलोकनी दोहा मुक्तकजीवन जीवन के इस खेल में,कभी मिले गर हार ।हार मान मत बैठिए , पुनः कर्म कर सार ।।सार जीवनी का यही , नहीं छोड़ना आस ।आस पूर्ण होगा तभी , सद्गुण हिय में धार ।। जीवन तो बहुमूल्य है , मनुज गँवाये व्यर्थ ।व्यर्थ मौज मस्ती किया , नहीं समझता अर्थ ।।अर्थ

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लेखनी तू आबाद रहे – बाबूराम सिंह

हिंदी कविता

कविता लेखनी तू आबाद रह ——————————- जन-मानस ज्योतित कर सर्वदा, हरि भक्ति प्रसाद रह। लेखनी तूआबाद रह। पर पीडा़ को टार सदा, शुभ सदगुण सम्हार सदा। ज्ञानालोक लिए उर अन्दर, कर अन्तः उजियार सदा। बद विकर्म ढो़ग जाल फरेब का, कभी नहीं फरियाद रह। लेखनी तू आबाद रह। शुभ सदगुण सत्कर्म सिखा, सत्य धर्म की

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क्यों करता हूँ कागज काले – डी कुमार–अजस्र

हिंदी कविता

क्यों करता हूँ कागज काले.. क्यों करता हूं कागज काले …??बैठा एक दिन सोच कर यूं ही ,शब्दों को बस पकड़े और उछाले ।आसमान यह कितना विस्तृत ..?क्या इस पर लिख पाऊंगा ?जर्रा हूं मैं इस माटी का,माटी में मिल जाऊंगा। फिर भी जाने कहां-कहां से ,कौन्ध उतर सी आती है ..??अक्षर का लेकर स्वरूप

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चलो,चले मिलके चले – रीतु प्रज्ञा

हिंदी कविता

विषय-चलों,चले मिलके चलेविधा-अतुकांत कविता *चलो,चले मिलके चले* ताली एक हाथ सेनहीं बजती कभीचलने के लिए भीहोती दोनों पैरों की जरूरतफिर तन्हा रौब से न चले,चलो,चले मिलके चले।शक्ति है साथ मेंनहीं विखंड कर सकता कोईकरता रहता जागृत सोए आत्मा कोहरता प्रतिपलउदासीपन, असहनीय दर्द कोछोड़ साथियों को यारान पथ पर बढ़ चलेचलो, चले मिलके चलेहोती है विजयक

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