शांत—और इसलिए खतरनाक

शांत—और इसलिए खतरनाक

एक शांत मनुष्य
कमज़ोर नहीं होता।

वह खतरनाक होता है।

क्योंकि
उसके भीतर
संदेह नहीं होता—
और
जिसे संदेह नहीं,
उसे बहकाया नहीं जा सकता।

उसके पास
कुछ पाने की
जल्दी नहीं होती—
और
जिसे कुछ पाना नहीं,
उसे ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता।

सच्चा विश्राम
झूले में लटकना नहीं है।
बिस्तर में सिमटना नहीं है।

सच्चा विश्राम
तूफ़ान के बीच स्थिर रहना है।

पसीने में भी
शांत।
दौड़ते हुए भी
शांत।
घायल होकर भी
शांत।

यह वह शांति नहीं
जो विशेष परिस्थितियों की मोहताज़ हो—
सप्ताहांत,
छुट्टी,
किसी प्रिय क्षण की।

यह
भीख माँगने वाली
शांति नहीं है।

यह स्वभाव है।

अप्रयास।
अशर्त।
अपरिवर्तनीय।

ऐसा मनुष्य
भीतर से
स्थिर रहता है—
और
वहीं से
तूफ़ान चुनता है।

लड़ाइयाँ उठाता है।
ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ता है।
अराजकता में उतरता है।

मजबूरी से नहीं—
स्वतंत्रता से।

बाहर से
वह तनावग्रस्त दिख सकता है—
पर
वह तनाव
अलग गंध रखता है।

वह
डर से नहीं उपजा।
सुरक्षा की
छोटी चाह से नहीं उपजा।

वह सिर्फ़
कार्य का दबाव है—
जो केंद्र तक
कभी पहुँचता ही नहीं।

जैसे
अचल पर्वत पर
बरसती वर्षा।
या
गहरे सागर की सतह पर
उछलती लहरें।

अंदर
कुछ भी नहीं हिलता।

शांत मनुष्य
न निष्क्रिय है,
न आलसी,
न उदासीन।

वह
सिर्फ़
अछूता है।

और यही
उसे
खतरनाक बनाता है—

उन सब के लिए
जो
दूसरों के
बंधन पर
जीते हैं।

मनीभाई नवरत्न

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