8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

दहेज दानव

दहेज सामाजिक बुराई पर आधारित कविता

टिप्पणी बन्द दहेज दानव में

हिंदी कविता : मैंने खोल दिये हैं, पावों की अनचाहे बेड़ियां (मनीभाई नवरत्न)

अब नहीं रुकूंगी, नित आगे बढूंगी मैंने खोल दिए हैं , पावों की अनचाहे बेड़ियां। जो मुझसे टकराए , मैं धूल चटाऊंगी हाथों में डालूंगी , उसके अब हथकड़ियां।। (१)…

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नारी
kavita

नारी

हे नारी! तू क्यों शर्मशार  है? समाज से भला क्यों गुहार है? मत मांग, इससे कोई दया की भीख । वो सब बातें जिनमें पुरूष का वर्चस्व, उन सबको तू…

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ओ नारी- मनीभाई नवरत्न

ओ नारी- मनीभाई नवरत्न जिन्दगी चले ना, बिन तेरे ओ नारी!उठा ली तूने,  सिर अपने  ऐसी जिम्मेदारी । मर्दों ने नाहक किये खुद पे ऐतबार ।सच तो यह है कि…

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चोका : हे नारी तू खास है

चोका:- नारी ★★★★★ हर युद्ध का जो कारण बनता लोभ, लालच काम ,मोह स्त्री हेतु पतनोन्मुख इतिहास गवाह स्त्री के सम्मुख धाराशायी हो जाता बड़ा साम्राज्य शक्ति का अवतार नारी…

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चिरागे धरती सिया समागे

??चिरागे धरती सिया समागे?? ठाढ़े - ठाढ़े देखत रहिगे , अकबकागे दरबार ! चिरागे धरती सिया समागे , छोड़के सकल संसार !! कईसन निष्ठुर होगे , जगत पति श्री राम…

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नारी की सूखे गुलाब की तरह वजूद को बताते कवयित्री विजिया गुप्ता समिधा जी ये रचना, जरूर पढ़िये (mai hu naa)

*मैं हूँ ना* मेरी साँसों में बसे हो तुम,प्राणवायु की तरह।हृदय के स्पंदन में,मधुर संगीत की तरह।सुबह की पहली किरण से,रात के अंतिम चरण तक।केवल,तुम ही तुम हो।तुम्हारे घर की…

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स्त्री की व्यथा को बताती हुई विजिया गुप्ता समिधा की यह कविता भी द्रवित कर देगी (Vijiya gupta samidha)

स्त्री की व्यथा वह भी एक स्त्री थी।उसकी व्यथा,मुझे ,मेरे अंतर्मन को,चीरकर रख देती है।टुकड़े-टुकड़े हो बिखर जाती है,मेरे अंदर की नारी।जब महसूस करती है ,उसकी वेदना ।कितना कुछ सहा उसने,भिक्षा…

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स्त्री एक दीप-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा'(Stri-Ek Deep)

बदलती रही.... -------स्त्री बदलती रहीससुराल के लिएसमाज के लिएनए परिवेश मेंरीति-रिवाजों मेंढलती रही......स्त्री बदलती रही!सास-श्वसुर के लिए,देवर-ननद के लिए,नाते-रिश्तेदारों के लिएपति की आदतों को न बदल सकीखुद को बदलती रही!इतनी…

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सत्य की खोज में नारी – रजनी श्री बेदी(satya ki khoj me naari)

अगर सत्य की खोज मेंछोड़ती घर द्वारएक कमसिन बेबसजिज्ञासु नारतो क्या ,बन पाती वोमहात्मा बुद्धन जाने कितने होते उसके भीतर बाहर युद्ध ही युद्धकटाक्ष,लाँछन,कर्ण भेदी ताने होते। गैर तो गैर,अपने भी उसके बेगाने होते।हाथ…

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