ओ नारी- मनीभाई नवरत्न

ओ नारी- मनीभाई नवरत्न

जिन्दगी चले ना, बिन तेरे ओ नारी!
उठा ली तूने,  सिर अपने  ऐसी जिम्मेदारी ।

मर्दों ने नाहक किये खुद पे ऐतबार ।
सच तो यह है कि नारी होती जग की श्रृंगार ।
महक ऐसे , फूल जैसे खिल उठे क्यारी क्यारी ।
रोशन होता रहे तेरा जी,  फैले ज्ञान की चिनगारी ।।

संयमित रह, सुशोभित रह
तुझे ईश्वरीय वरदान है ।
घर बनाती हरेक मकान  को।
तेरे साये में, तेरा परिवार है।


समाज की बीड़ा उठाने को तोड़ चली चारदीवारी ।
रोशन होता रहे तेरा जी,  फैले ज्ञान की चिनगारी ।।

नारी! तू चीज नहीं कोई उपभोग की ।
तुमसे टिकी है मर्यादा आज भी लोग की ।
ना बढ़े तेरे कदम  उस ओर पे
जिस पथ पर आधुनिकता  है ढोंग की।


तेरे एक गलत के फिराक में है यहाँ कई शिकारी ।
रोशन होता रहे तेरा जी,  फैले ज्ञान की चिनगारी ।।

मनीभाई नवरत्न
मनीभाई नवरत्न

📝 कवि परिचय

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

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