अंधा बंधन, आजीवन कारावास
यदि
बुद्धिमान होकर
विवाहित हो—
सुंदर।
यदि
बुद्धिमान होकर
अविवाहित हो—
वह भी
सुंदर।
मुद्दा
विवाह नहीं,
मुद्दा
बुद्धि है।
मुझे
विवाह से
न पक्ष है,
न विरोध।
मुझे
उस मन में
रुचि है
जो
सुरक्षा की ओर
भागता है,
जो
किसी दूसरे को
अपना बनाकर
क़ैद करना चाहता है।
उसी मन को
देखना
ज़रूरी है।
विवाह
केवल
साथ रहने का
नाम नहीं—
वह
काम की दिशा बदल देता है,
संतानों से
रिश्ता गढ़ देता है,
जीवन के
लगभग हर कोने को
छू लेता है।
इसीलिए
विवाह की बात होती है—
न कि
आदेश देने के लिए,
बल्कि
आत्म-जाँच के लिए।
मेरा काम
नियम थमाना नहीं,
दर्पण
थमाना है।
क्योंकि
जो भीतर दिखता है,
वह
किसी भी
सामाजिक व्यवस्था से
अधिक
महत्वपूर्ण है।
खुद से
तुम्हारा संबंध
किसी और से
किए गए
हर संबंध से
गहरा है।
दो लोग
जीवन भर
साथ रह सकते हैं—
और
वह
अद्भुत हो सकता है।
पर
यदि वे
अंधे होकर मिले हों?
यदि
उन्हें
खुद का
ज्ञान न हो—
देह का नहीं,
इच्छा का नहीं,
प्रेम का नहीं,
शोषण का नहीं?
यदि
भूल
अस्थायी न हो,
बल्कि
अज्ञान की
मुहर के साथ
स्थायी कर दी गई हो?
तब
वह साथ
घर नहीं,
कारावास बन जाता है—
जहाँ
दरवाज़ा खुला है,
पर
देखने की
आँखें बंद हैं।





