अतीत ही वर्तमान है

अतीत ही वर्तमान है

अतीत
पीछे नहीं रहता—
यदि तुमने उससे
सीखा नहीं।

वह भविष्य बनकर
लौट आता है,
नए कपड़ों में,
नए नाम से।

लोग कहते हैं—
भूल जाओ।
छोड़ दो।
केवल वर्तमान में जियो।

पर यह ज्ञान नहीं,
यह पलायन है—
स्वतंत्रता का
भेष बदले डर।

जिसे तुम
“अभी” कहते हो,
वह अक्सर
बीते हुए का
छलावा होता है।

वर्तमान
कोई नई ज़मीन नहीं—
वह अतीत की
छाया है,
जो आज पर
पड़ी हुई है।

यदि कल
आज पर हावी है,
तो आज को
मुक्त करना होगा—
कल से आँख मिलाकर।

अतीत
अपने आप
छूटता नहीं।
चेतना चाहिए।
साहस चाहिए।

लौटो उस जंगल में
जहाँ तुम्हारे
कदम रुके थे।
वे रास्ते
अब भी जीवित हैं।

वे अब भी
तुमसे बात करते हैं—
और तुम
यह नाटक मत करो
कि उनकी भाषा
तुम भूल चुके हो।

आज
बीते हुए
अलाव की
राख है।
और कल
उसी चिन्ह को
ढोएगा—
जब तक तुम
बीच में
हस्तक्षेप न करो।

दिशा बदलनी है
तो
पहले पकड़ ढीली करो।
उन जंग लगे
लंगरों को छोड़ो
जिन्हें तुमने
पहचान समझ लिया है।

कल की गांठों में
उलझे रहकर
न नृत्य होता है,
न मुक्ति का गीत।

जो समझा नहीं,
वही शासन करता है।
जो देखा नहीं,
वही पीछा करता है।

सीखना
भागना नहीं है।
सीखना है—
घाव को धोना,
ढकना नहीं।

यह कोई
नाटकीय मुठभेड़ नहीं—
यह
ईमानदार भेंट है
खुद से।

समझ
तुम्हें केवल
घटना से मुक्त नहीं करती—
वह तुम्हें
उस व्यक्ति से भी
आज़ाद करती है
जो तुम
उस घटना के कारण
बन गए थे।

Scroll to Top