एक ही भूल सौ बार

एक ही भूल सौ बार

क्या सच में
कोई नई भूल होती है?

ध्यान से देखो—
जो आज तुम्हें गिरा रहा है,
वही तो
पाँच साल पहले भी
तुम्हें हराकर गया था।

नाम बदल गए,
चेहरे बदल गए,
पर
प्रवृत्ति?
वह वहीं की वहीं है।

गिरने की जगह बदली,
समय बदला,
बहाना बदला—
पर गिरना
क्या कभी बदला?

तुम कहते हो—
इस बार अलग है।
पर क्या सच में?
या फिर
पुराना ढर्रा
नए कपड़ों में लौट आया है?

तुम
नई भूलें नहीं कर रहे।
तुम
पुराने पैटर्न
रीसायकल कर रहे हो।

मन चालाक है।
वह
एक ही गड्ढे में
बीस बार गिरता है—
और हर बार कहता है:
यह गड्ढा नया है।

यह अब भूल नहीं है।
यह एक आदत है।
सीखने से इनकार।
अचेतन बने रहने की
प्रतिबद्धता।

भूल
एक बार होती है।
दो बार—
आदत।
तीन बार—
जीवन-शैली।

और उसके बाद?
वह
पहचान बन जाती है।

इन्हें
भूल कहना छोड़ दो।
इन्हें
उनके असली नाम से पुकारो—

तुम स्वयं।

Scroll to Top