अधूरापन का उद्योग”

“अधूरापन का उद्योग”

तुमसे कहा गया—
तुम पूरे नहीं हो।

इसलिए
तुम दौड़े—
डिग्रियों के पीछे,
पदोन्नतियों के पीछे,
रिश्तों,
सामानों,
सपनों के पीछे।

एक खाली जगह भरने,
जो शायद
कभी थी ही नहीं।

इसे
प्रेरणा कहा गया।

पर यह
डर पर पलती है,
तुलना पर जीती है,
शर्म से बिकती है।

पहले
तुम्हें तोड़ा गया,
फिर
मरहम बेचा गया।

कहा गया—
देखो
फलाँ का बेटा।

कहा गया—
आदमी के बिना
तुम कुछ नहीं।

कहा गया—
बच्चा नहीं?
तो अधूरी।

एक है?
दो करो।

फ्लैट है?
विला चाहिए।

तभी
तुम पूरे होओगे।

यह
देखभाल नहीं,
हिंसा है।

यह
प्रेम नहीं,
भ्रष्टाचार है।

‘मोटिवेशन’ के भीतर
एक शब्द छुपा है—
मोटिव।

मतलब—
मुझे कुछ चाहिए,
जो मेरे पास नहीं।

मतलब—
मैं
काफ़ी नहीं हूँ।

यही
झूठ है।
यही
ज़हर है।

इस झूठ को मानते ही
तुम
सब कुछ ख़रीदने लगते हो—
क्रीम,
कोर्स,
कोच,
क़िस्से।

पहले
बीमारी बेची गई,
फिर
इलाज की चाह।

और तुम
भागते रहते हो—
किसी चीज़ की ओर नहीं,
खुद से
दूर।

प्रेरणा
ताक़त नहीं,
भ्रम है।

यह
उस मन का शोर है
जो
खुद को नहीं जानता।

असल कर्म
प्रेरणा से नहीं,
स्पष्टता से
जन्म लेता है।

जब तुम
देख लेते हो—
कि तुममें
मूल रूप से
कुछ भी गलत नहीं।

तुम्हें
प्रेरणा नहीं चाहिए।

तुम्हें
मुक्ति चाहिए—
उस झूठ से,
कि तुम
अधूरे हो।
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