“माता-पिता, पहले स्वयं को उठाओ”
बच्चे को सँवारने से पहले
खुद को सँभालो।
क्योंकि
बच्चा
तुम्हारे उपदेश से नहीं,
तुम्हारी स्थिति से
सीखता है।
यदि घर में
जाग्रत माँ है,
जाग्रत पिता है—
तो
बच्चे के डर
बिना समझाए
घुल जाते हैं।
तुम्हारी उपस्थिति
पाठ बन जाती है।
पहला कर्तव्य
बच्चे को ठीक करना नहीं,
खुद को
जगाना है।
क्योंकि
घायल मन
केवल
घाव ही
दे सकता है।
तुम
प्रेम का अभिनय कर सकते हो,
पर
अचेतन
हर स्पर्श में
टपक जाता है।
हर मौन
कुछ सिखा देता है।
यही विडंबना है—
हम
अंधेरे से चिपके रहते हैं,
और
बच्चों को
रोशनी देने का
सपना देखते हैं।
अचिकित्सित होकर
चिकित्सक बनने की
आकांक्षा।
यह पालन-पोषण नहीं,
भ्रम है।
जो तुम्हारे पास नहीं,
वह
तुम दे नहीं सकते।
जो तुम
जीते नहीं,
वह
तुम सिखा नहीं सकते।
डर से भरे होकर
मार्गदर्शक
नहीं बन सकते।
हम चाहते हैं—
बच्चे स्वतंत्र हों,
पर
खुद बंधे रहते हैं।
हम चाहते हैं—
बच्चे आनंदित हों,
पर
चेहरे पर
पुराना शोक
ढोते हैं।
रोशनी
छाया से भरे हाथों से
सौंप नहीं सकते।
इसलिए
अगर सच में
अपने बच्चे से प्रेम है—
तो
उसके भविष्य की
चिंता छोड़ो।
अपने भीतर
क्रांति शुरू करो।
अपनी चेतना उठाओ।
अपनी ईमानदारी उठाओ।
अपना जीवन उठाओ।
क्योंकि
जब माता-पिता
ऊपर उठते हैं,
तभी
बच्चों को
पंख मिलते हैं।
तब
कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
तुम्हारा होना ही
आश्रय बन जाता है।
तुम्हारी ख़ामोशी
शास्त्र बन जाती है।
तुम्हारा जीवन
उनका
सबसे बड़ा वरदान।
आदत से
बच्चे मत पालो।
जागरण से पालो।
और याद रखो—
इसके लिए
सबसे पहले
तुम्हें ही
जागना होगा।





