“पवित्र आठ-चरणीय आत्महत्या”
तुम भटके नहीं हो—
तुम राजमार्ग पर हो।
चमकदार,
चौड़ा,
सुरक्षित।
और यही
ख़तरा है।
जन्म,
पढ़ाई,
नौकरी,
शादी,
घर,
गाड़ी,
बच्चे,
झगड़े,
थकान,
मृत्यु।
जीवन नहीं—
कन्वेयर बेल्ट।
इसे
पवित्र कहा गया।
क्योंकि
सब यही करते हैं।
और जो
सब करते हैं,
उसे
कौन सवाल करता है?
हम आधे रास्ते पर हैं,
फिर भी
कहते हैं—
“मेरा जीवन अलग है।”
अलग कैसे?
सड़क वही,
ईंधन वही,
भीड़ वही।
पर उम्मीद—
कि मंज़िल
अद्भुत होगी।
अरबों लोग
इसी राह से गुज़रे,
सम्मानजनक निराशा में
डूबे।
पर हम मानते हैं—
हम विशेष हैं।
यह
दिलासा है,
दृष्टि नहीं।
तुम अपना रास्ता
नहीं चल रहे,
तुम
डिफ़ॉल्ट चला रहे हो।
और डिफ़ॉल्ट का
एक ही अंत है—
अचेतन उपभोग,
खोखली सफलता,
और
बिना जिए
मर जाना।
नई मंज़िल चाहिए?
तो
नई दिशा लो।
और नई दिशा के लिए
पहला कदम—
रुकना है।
ठहरो।
देखो।
पूछो।
क्योंकि
पीटी हुई राह
आगे नहीं ले जाती—
वह
पीटती है।
जीवन
चलते रहने से
नहीं बदलता।
जीवन
तब बदलता है,
जब
भीड़ से हटकर
तुम
मुड़ते हो।





