आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear)
डर का इलाज
आत्मविश्वास नहीं होता।
वह केवल
डर पर डाला गया
एक मुखौटा है।
गोली की तरह—
क्षणिक राहत,
पर बीमारी जस की तस।
डर मिटता नहीं,
चुपचाप भीतर
और गहराता है।
निर्भयता
सीना तानकर खड़े होने में नहीं,
बल्कि
किसी के सामने
खड़े होने की ज़रूरत न रहने में है।
जब खोने को
कुछ नहीं होता,
तो डर किस बात का?
जब तक मन
दुनिया से कुछ चाहता है—
स्वीकृति,
पहचान,
महत्त्व—
तब तक
डर रहेगा।
तुम लोगों से नहीं डरते,
परिस्थितियों से नहीं डरते—
तुम डरते हो
अपने बनाए हुए
स्व-चित्र के टूटने से।
यही निर्भरता है।
जितना मन
दूसरों में उलझा रहता है,
उतना भीतर
खाली होता जाता है।
डर कमजोरी नहीं है।
डर संकेत है—
भीतर बहुत शोर है।
इसी डर से
आत्मविश्वास की चाह जन्म लेती है—
शक्ति के रूप में नहीं,
भेष के रूप में।
जितना डर,
उतना दिखावा।
पर दिखना
शांति नहीं है।
प्रदर्शन
स्वतंत्रता नहीं है।
आत्मविश्वास
डर का विरोधी नहीं,
उसकी परछाईं है।
इसलिए मत पूछो—
आत्मविश्वास कैसे बढ़े?
पूछो—
मुझे उसकी ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
जब भीतर की जगह
साफ़ होती है,
जब मन
दुनिया का कूड़ादान नहीं रहता,
तब आत्मविश्वास
अपने आप गिर जाता है—
अनावश्यक।
भीतर
एक गर्भगृह हो—
जहाँ न प्रशंसा पहुँचे,
न निंदा।
केवल मौन।
केवल स्पष्टता।
और जब भी डर उठे,
काँपना आए,
या किसी के सामने
आशा जगे—
याद रखना:
यह डर
निर्भरता से जन्मा है।
मैं निर्भर नहीं हूँ।
मुझे होना भी नहीं है।
मैं स्वतंत्र हूँ।
डर से लड़ो मत।
डर को देखो।
वहीं
निर्भरता छिपी है।
और जहाँ निर्भरता समाप्त,
वहीं
डर का भी
अंत।
C





