Desire Invests, Love Nurtures
(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद)
अगर कोई
तुम्हारे जीवन में
इसलिए है
कि वह
तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करे,
तो वहाँ प्रेम नहीं—
बस
आसक्ति है,
निर्भरता है,
जकड़न है,
और धीरे-धीरे
पीड़ा है।
ज़रूरत पर टिका रिश्ता
अहिंसक नहीं हो सकता,
वह
एक सूक्ष्म हिंसा है—
जहाँ देना नहीं,
पाना मुख्य लक्ष्य होता है।
अधिकतर लोग
प्रेम को
इच्छा का
सभ्य नाम दे देते हैं।
और इच्छा
हमेशा निवेश करती है—
लाभ के लिए।
इसलिए
हमारा प्रेम
लेन-देन बन जाता है।
जितना अधिक
हम प्रेम दिखाते हैं,
उतनी ही
वसूली की बेचैनी
भीतर पलती है।
यही तो हिंसा है।
मैं किसी में
निवेश करता हूँ,
और जब
लाभ नहीं मिलता—
तो
साँसें उखड़ती हैं,
घबराहट बढ़ती है,
गुस्सा फूटता है।
कभी
दूसरे के बाल
खींचने का मन करता है,
कभी
अपने ही बाल
नोच लेने का।
और फिर भी
हम स्वीकार नहीं करते
इस
हताशा के नंगे नृत्य को।
यह हताशा
कहाँ से आती है?
इस भ्रम से—
कि इच्छा ही
प्रेम है।
नहीं।
इच्छा निवेश करती है।
प्रेम पोषण करता है।
इच्छा
माँगती है,
प्रेम
देता है।
जिसने
अपने आप को नहीं जाना,
वह
हमेशा इच्छा में जिएगा,
और
प्रेम के योग्य
कभी नहीं हो पाएगा।
प्रेम
ज़रूरत से नहीं,
परिपूर्णता से
जन्म लेता है।
जहाँ
देने में
आनंद हो,
और पाने की
कोई शर्त न हो—
वहीं
प्रेम
शांत होकर
साँस लेता है।





