जंजीर नहीं, पंख दो
यदि प्रेम है,
तो बाँधो मत।
यदि प्रेम है,
तो हल्का करो।
जो रिश्ता
तुम्हारे जीवन में
नई बेड़ियाँ जोड़ दे,
वह प्रेम नहीं—
एक जाल है।
फूलों और इत्र में
लिपटा हुआ पिंजरा।
ईमानदारी से देखो—
इस संबंध का
सार क्या है?
अपने आप से पूछो—
यह व्यक्ति
तुम्हें क्या देता है?
गुलाब
या
पुस्तकें?
भोग
या
दृष्टि?
आनंद
या
समझ?
उत्तर
इतना भी
छुपा हुआ नहीं।
चेतना का
मूल अभिशाप है—
देह से
अपनी पहचान।
जितना अधिक
तुम देह में
अटके हो,
उतना ही
नीचा
जीवन जीते हो।
इस व्यक्ति के साथ
तुम
क्या अधिक
देह बन जाते हो?
क्या वह
तुम्हें
एक शरीर की तरह
देखता है?
क्या तुम
उसे
एक शरीर की तरह
देखते हो?
यदि हाँ—
तो
भागो।
यह प्रेम नहीं है।
यह
पतन है।
जब तुम
साथ होते हो,
तो
किस पर
बात होती है?
ज्ञान पर?
साहित्य पर?
दर्शन पर?
विज्ञान पर?
दुनिया की
दशा पर?
या फिर
अधिकतर
होंठों,
कूल्हों,
छातियों पर?
और जब
तुम साथ होते हो,
तो
करते क्या हो?
क्या
एक-दूसरे की
समझ को
पोषित करते हो?
क्या
एक-दूसरे को
किसी ऊँचे सत्य की
याद दिलाते हो?
या फिर
सिर्फ़
न्यूनतम साझा स्तर पर
भोग करते हो?
ध्यान दो।
ये
छोटी बातें नहीं हैं।
ये
सूचक हैं—
शक्तिशाली,
निर्णायक।
यदि तुम
इन्हें नहीं देख पा रहे,
तो
इसलिए नहीं कि
वे अस्पष्ट हैं—
बल्कि इसलिए कि
तुम
अंधे बने रहना
चाहते हो।
एक रिश्ता
जीवन को
ऊपर उठा सकता है।
वह
आकाश तक
सीढ़ी बन सकता है।
पर अक्सर
वही रिश्ता
वह बोझ बन जाता है
जो
अनमोल जीवन को
औसतपन और
अँधेरे में
घसीट ले जाता है।
यदि तुम
सच में
किसी से प्रेम करते हो—
तो
उसे पकड़ो मत।
उस पर अधिकार मत जताओ।
उसे
सिर्फ़ देह में
मत घटाओ।
उसे
पंख दो।
उसे
प्रकाश दो।
उसे
आत्म-ज्ञान दो।
और फिर—
उसे
खुद उड़ने दो।
क्योंकि
प्रेम
उड़ान से डरता नहीं।
डरता है
सिर्फ़
अधूरापन।





