पिंजरा खिलाता है, आकाश मुक्त करता है

पिंजरा खिलाता है, आकाश मुक्त करता है

हम
स्वतंत्रता के गीत गाते हैं।
उसकी पूजा करते हैं।
उसके सपने देखते हैं।

लेकिन
जब स्वतंत्रता
वास्तव में
दरवाज़ा खटखटाती है—
तो
हम
दरवाज़ा बंद कर लेते हैं।

क्यों?

क्योंकि
पिंजरा
खिलाता है।

वह
रोटी देता है।
सुरक्षा देता है।
आश्वासन देता है।

वह कहता है—
यहीं रहो।
छोटे बने रहो।
मैं सब सँभाल लूँगा।

और स्वतंत्रता?

स्वतंत्रता
कोई वादा नहीं करती।

वह कहती है—
अब तुम
खुद के सहारे हो।
कोई मुफ्त भोजन नहीं।
कोई गारंटी नहीं।

आकाश तुम्हारा है—
उड़ो।

और हाँ,
आकाश में
उकाब हैं।
गिद्ध हैं।
तूफ़ान हैं।

इसलिए
हम मन ही मन कहते हैं—
हाँ,
यह पिंजरा है,
पर
खाना ठीक-ठाक है।
और
उकाबों की
ज़रूरत भी किसे है?

सच यह है—
हम
स्वतंत्रता नहीं चाहते।

हम
सुविधा चाहते हैं।
सुरक्षा चाहते हैं।
कोई और
हमारे जीवन की
ज़िम्मेदारी ले ले—
यही चाहते हैं।

इसलिए
हम
पिंजरे से
सहमति कर लेते हैं।
और
स्वतंत्रता से
असहमति।

पर
यहाँ
एक तथ्य है—

तुम
पिंजरे में
कभी शांत नहीं रह सकते।

क्योंकि
स्वतंत्रता
कोई विलास नहीं।
कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं।

वह
तुम्हारा
स्वभाव है।

इसलिए
अपने आप से
पूछो—
क्या मैं
सच में
इससे संतुष्ट हूँ?

क्योंकि
जब तक
तुम
स्वतंत्रता से
सहमति नहीं करोगे,
तब तक
बेचैनी
बनी रहेगी।

अधूरापन
बनी रहेगा।

तुम
एक ऐसे पक्षी बने रहोगे
जिसके पंख हैं—
पर
डर से
मुड़े हुए।

और याद रखो—

एक दिन
तुम्हें
उड़ना ही पड़ेगा।

इसलिए नहीं
कि कोई
तुम्हें
धक्का देगा—

बल्कि इसलिए
कि
एक दिन
रेंगना
तुम्हें
असह्य लगने लगेगा।

उस दिन
पिंजरा
खाना देना
बंद नहीं करेगा—

पर
तुम
उसे
स्वीकार करना
बंद कर दोगे।

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