तुम अकेले जन्मे नहीं हो

तुम अकेले जन्मे नहीं हो

तुम अकेले पैदा नहीं हुए।
देह
तुम्हारे साथ ही आई।

एक ही क्षण,
एक ही जन्म—
फिर भी
दोनों का स्वभाव
एक नहीं।

चेतना
मुक्ति चाहती है।
देह
पुरानी आदतों में
सुरक्षा खोजती है।

दोनों
एक ही पते पर
रहने को विवश हैं।

देह के बिना
चेतना का
कोई मंच नहीं।
चेतना के बिना
देह
सिर्फ़
एक निर्जीव ढांचा है।

पर
एक छत के नीचे रहना
समानता नहीं होता।

किसी एक को
नेतृत्व करना ही होगा।

या तो
चेतना
आदेश देगी—
या
देह
हुक्म चलाएगी।

यह
साथियों का रिश्ता नहीं।
यह
स्वामी और साधन का
संबंध है।

देह
तुम्हारी है।
तुम
देह के नहीं हो।

यदि
सजगता का शासन नहीं होगा,
तो
आदतों की तानाशाही
अपने आप
स्थापित हो जाएगी।

तुम
या तो
बोध में
ऊपर उठोगे—
या
देह की
मजबूरियों के आगे
घुटने टेक दोगे।

क्या
देह को जीतना
हिंसा है?

नहीं।

यह
देखने की बात है।

देह की
अशांत प्रकृति को
जैसा है
वैसा देख लेना।
और
चेतना की
प्रकाशमान क्षमता को
पहचान लेना।

यही
विजय है।

जब
देह को
पड़ोसी की तरह
मानते हो—
उपयोगी,
आवश्यक—
पर
घर का मालिक नहीं—

तभी
संतुलन आता है।

यही
स्वाधीनता है।

यही
मुक्ति है।

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