जीत से पहले पूछो—तुम क्या जीत रहे हो?

जीत से पहले पूछो—तुम क्या जीत रहे हो?

हर जीत
सफलता नहीं होती।
अगर लक्ष्य ही मूर्खतापूर्ण हो,
तो तेज़ी से पहुँचना भी
कोई गौरव नहीं।

भीड़ को खुश करने के लिए
दौड़ना,
अंधी चाह के पीछे
भागना—
यह कर्म नहीं,
भटकाव है।

पहले जानो—
तुम कौन हो,
और तुम्हें सच में चाहिए क्या।

क्योंकि
गलत युद्ध में मिली जीत
हार से भी बदतर होती है।

यह मत पूछो—
“जो भी करूँ, उसमें सफल कैसे होऊँ?”
यह “जो भी”
एक खुला घाव है।
इसे बंद करो।

मनमाना कर्म
जीवन को
तुच्छ बना देता है।

सोचो—
क्या करने योग्य है,
क्या समय के लायक है,
क्या आत्मा के अनुकूल है।

सिर्फ दो कर्म
सार्थक हैं—
एक,
जो भीतर की पूर्णता से
स्वतः बहते हैं,
आनंद का नृत्य बनकर।

और दूसरे,
जो पूर्णता की ओर ले जाएँ—
प्रेम का साहस,
बुद्धि का प्रकाश।

इसलिए ठहरो।
सोचो।
जल्दी मत करो।

खुले रहो,
सचेत रहो,
जिज्ञासु बनो।

जीवन अनमोल है।
समय
किसी अयोग्य लक्ष्य
पर गँवाने की वस्तु नहीं।

जीत से पहले
एक प्रश्न ज़रूर पूछो—
तुम
क्या
जीत रहे हो?

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