पहले से समृद्ध — बस भूल गए

पहले से समृद्ध — बस भूल गए

तुम्हें
यह सिखाया गया है
कि संपन्नता
कुछ पाने से आती है।

दौड़ो।
जोड़ो।
दिखाओ।
थामे रहो।

धन,
संपत्ति,
डिग्रियाँ,
रिश्ते,
प्रतिष्ठा,
अनुभव—
सब
दुनिया से उधार।

और
जो दुनिया देती है,
वह
छीन भी सकती है।

जिस प्रतिष्ठा पर
तुम टिके हो,
वह
किसी और की
मान्यता है।

आज मिली,
कल बदल गई।

तुम्हारी छवि
दूसरों के मन में है—
और
मन
रातों-रात
पलट जाते हैं।

धीरे-धीरे
तुम
जो जोड़ते हो,
उसी पर
निर्भर होने लगते हो।

और फिर
भूल जाते हो—
कि तुम
वह नहीं हो
जो तुम्हारे पास है।

अब
डर शुरू होता है।

खोने का डर।
घटने का डर।
गिरने का डर।

यही
संचित संपत्ति का
छुपा हुआ श्राप है—
वह
असुरक्षा को
जन्म देती है।

पर
एक और संपन्नता है।

ऐसी
जिसे
दुनिया
छू नहीं सकती।

जो
बाहर से
आती नहीं,
भीतर से
चमकती है।

यह प्रश्न
“मेरे पास क्या है?”
का नहीं है।

यह प्रश्न है—
“मैं क्या हूँ?”

तुम्हारे होने का
प्रकाश।

वह
मौन दीप्ति
जो
सब कुछ छिन जाने पर भी
बनी रहती है।

यह
वस्तुओं की
चमक नहीं है।

यह
वह प्रकाश है
जिससे
वस्तुएँ
दिखाई देती हैं।

विडंबना देखो—

पाने की
हड़बड़ी में
तुम
भूल जाते हो
कि तुम
पहले से
समृद्ध हो।

सबसे बड़ा खज़ाना
पहले से
तुम्हारा है—
सुरक्षित,
अछीनने योग्य नहीं।

यह
किसी खाते में
नहीं बैठा।

यह
तुम्हारे
होने में
जीता है।

इसलिए
और जोड़ने निकलने से पहले—

रुको।

पहचानो
कि तुम्हारे पास
क्या नहीं,

बल्कि
तुम
क्या हो।

क्योंकि
जो इसे
पहचान लेता है,
वह
गरीबी से
सदा के लिए
मुक्त हो जाता है।

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