स्वतंत्रता की कीमत से मत डरो
स्वतंत्रता
संभव है।
जीवन को
उदासी का
एकरस गीत
बने रहने की
कोई मजबूरी नहीं।
वह
आनंद की
एक सजीव
सिंफ़नी बन सकता है—
यदि
तुम यह मानने का
साहस रखो।
अपने भीतर उठने वाली
छोटी आवाज़ों के आगे
इतनी जल्दी
समर्पण मत करो।
वे फुसफुसाएँगी—
तुम कौन हो
स्वतंत्रता चाहने वाले?
तुम तो
एक साधारण,
छोटे से प्राणी हो।
मत सुनो।
सिर्फ़ इस कारण से
कि तुम
सचेत हो—
तुम्हें
स्वतंत्र होने का
पूरा अधिकार है।
स्वतंत्रता
अक्सर
इस डर से रुक जाती है
कि उसकी
कीमत क्या होगी।
पर ध्यान दो—
जिस कीमत से
तुम डरते हो,
वह
अधिकतर
मन की
कल्पना मात्र होती है।
कहानियाँ—
जो तुम्हें
दूसरों ने सुनाईं,
या
जो तुमने
खुद गढ़ लीं।
स्वतंत्रता
खतरनाक नहीं होती।
वह
सिर्फ़
पुरानी निश्चितताओं के लिए
असहज होती है—
चाहे वे
निश्चितताएँ
तुम्हें
चोट ही क्यों न दे रही हों।
अतीत
जो भी रहा हो,
वर्तमान
जैसा भी हो,
तुम्हारे कर्मों का
ढेर
कितना ही बड़ा क्यों न हो—
यदि तुम
सचेत हो,
तो
मुक्ति
तुम्हारा
भाग्य है।
और
तुम्हें
आनंदित होने का
अधिकार है।
यह आनंद
साधारण सुख नहीं है।
यह
भोग का
उत्सव नहीं।
यह
ऐसी पूर्णता है
जिसमें
सुख और दुःख
सिर्फ़
लहरें रह जाते हैं—
गहरे
असीम सागर पर।
स्वतंत्रता की
कोई भी कीमत
तभी बड़ी लगती है
जब
तुम
अब भी
अस्वतंत्र हो।
जिस दिन
तुम
सच में
मुक्त हो जाते हो—
उस दिन
पीछे मुड़कर
देखते हो,
और पाते हो—
कीमत
कभी
इतनी बड़ी थी ही नहीं।
डर
कल्पना था।
और स्वतंत्रता—
तुम्हारी
स्वाभाविक
अवस्था।





