नया रास्ता नहीं, नई आँखें
यदि जीवन एक यात्रा है,
तो हम सब चल रहे हैं।
पर अधिकतर
अँधेरे में चल रहे हैं—
आँखों पर
पट्टी बाँधकर।
दुनिया ने
चलना सिखा दिया,
पर यह नहीं बताया
कि
किधर चलना है,
और
क्यों चलना है।
विडंबना तो यह है—
हम रास्ता ढूँढने की बात करते हैं,
जबकि
हमें यह भी स्पष्ट नहीं
कि
यात्री कौन है।
बुद्धि
कोई नया मार्ग नहीं बनाती।
वह
तुम्हारे वर्तमान मार्ग को
पूरा देखने की क्षमता देती है।
वह यह नहीं कहती—
सब छोड़ दो,
कहीं और चले जाओ।
वह
बस इतना कहती है—
ठहरो।
और
ध्यान से देखो।
जिस मिट्टी पर
तुम चल रहे हो,
जिस धूप में
तुम थकते हो,
जिनके साथ
तुम कदम मिलाते हो,
और
जिस मोड़ की ओर
तुम बढ़ रहे हो—
उन्हें
बिना धुँध के देखो।
आध्यात्म
कोई
दिव्य नक्शा नहीं देता।
वह
कोई
स्वर्गीय निर्देशांक
नहीं थमाता।
वह
एक दीपक देता है—
और कहता है:
जैसे हो,
जहाँ हो,
वहीं चलो—
पर
प्रकाश में।
तुम
बुद्धि के पीछे
नहीं चलते।
तुम
बुद्धि से
अपने रास्ते को
उजागर करते हो।
जिस धरातल पर
तुम पहले से हो—
उसी को
रोशन करते हो।
और धीरे-धीरे
देख पाते हो—
कि तुम
कहाँ से आए,
किस ओर
कुछ बुला रहा है,
और
सबसे ज़रूरी—
कि
चल कौन रहा है।
यदि परिवर्तन आवश्यक होगा,
तो
वह
जबरन नहीं आएगा।
वह
मित्र की तरह
आएगा।
और यदि
सत्य को जागना होगा,
तो
वह
ऊपर से नहीं उतरेगा—
वह
भीतर से
उभरेगा।
पवित्र मार्ग
तुम्हारे
दैनिक क़दमों से
अलग नहीं है।
वह
तुम्हारे ही
क़दम हैं—
जब
उन्हें
प्रकाश में
देख लिया जाए।





