जीवन भरो, वरना वह खुद भर जाएगा
अगर तुम
अपने जीवन को
ऊँचाई से नहीं भरोगे—
आनंद से,
बोध से,
सौंदर्य से,
पवित्रता से—
तो जीवन
खुद को भर लेगा।
और वह भरेगा
कचरे से।
कभी नौकरी के नाम पर,
कभी रिश्तों के बोझ में,
कभी किसी और शोर में—
जो दिखेगा ज़रूरी,
पर होगा खोखला।
मनुष्य
आलस्य के लिए पैदा नहीं हुआ।
वह
संघर्ष में जन्म लेता है।
पूरा जीवन
एक रणभूमि है।
पर प्रश्न यह नहीं कि
संघर्ष होगा या नहीं।
प्रश्न यह है—
किससे होगा?
तुम चाहो तो
ज़िंदगी बिता दो
छोटे-छोटे झगड़ों में,
अहंकार की होड़ में,
तुच्छ उलझनों में।
ये युद्ध नहीं—
बस
झंझट हैं।
ये थकाते हैं,
ऊँचा नहीं उठाते।
या फिर
एक ही युद्ध चुनो—
सच्चा,
केन्द्रीय,
योग्य—
जागृति का,
स्पष्टता का,
सत्य का।
अगर यह एकाग्र प्रतिबद्धता नहीं होगी,
तो ऊर्जा
अपने रास्ते खुद ढूँढ लेगी—
बिखर जाएगी,
रिसने लगेगी।
हज़ार दरारें।
तुम व्यस्त रहोगे,
शायद “एंगेज्ड” भी—
पर समर्पित नहीं।
और जीवन
धीरे-धीरे
बह जाएगा—
एक वार में नहीं,
बल्कि
हज़ार छोटे कटों से।
इसलिए
जीवन भरो—
उच्च से,
सार्थक से।
वरना
जीवन
तुम्हें भर देगा—
शोर से।





