पुरुष को एक ओर रखो
स्त्री के संसार का केंद्र
पुरुष नहीं होना चाहिए,
और पुरुष के संसार का केंद्र
स्त्री नहीं।
यह व्यवस्था
जंगल की है,
मनुष्यता की नहीं।
जब तक
शरीर, हार्मोन,
मातृत्व,
और घोंसला
जीवन का केंद्र बने रहते हैं,
मुक्ति
केवल शब्द रह जाती है।
जिस दिन
शरीर मालिक नहीं रहता,
उसी दिन
पुरुष भी
आसक्ति नहीं रहता।
रुको,
और खुद से पूछो—
जिसे तुम
इतना महत्वपूर्ण मान रही हो,
वह प्रेम है
या निर्भरता?
अक्सर
निर्भरता
भक्ति का वेश पहन लेती है।
एक असमान चित्र—
पुरुष का संसार
अक्सर फैला हुआ,
स्त्री का संसार
अक्सर सिमटा हुआ,
किसी एक चेहरे पर टिक गया।
यही असंतुलन
थकान बनता है,
तनाव बनता है,
धीरे-धीरे
घुटन बनता है।
शरीर,
जैविक भूमिका,
घर,
और पुरुष—
ये अलग-अलग नहीं,
एक ही उलझा हुआ जाल हैं।
स्त्री की
शरीर से मुक्ति
पुरुष से भी मुक्ति है।
और स्त्री की मुक्ति
पुरुष की भी मुक्ति बन जाती है।
कोई व्यक्ति,
कोई वस्तु,
कोई विचार
तुम्हारे ब्रह्मांड का
केंद्र नहीं हो सकता।
तुम
किसी को पाने के लिए नहीं,
खुद को पाने के लिए
पैदा हुई हो।
छोटे रहकर
बड़े सपनों का पीछा
व्यर्थ है।
छोटा न रहने का
अडिग संकल्प ही
आत्म-प्राप्ति है।
जिस क्षण
तुम
किसी और से
पूरा होने की भीख
मांगना छोड़ देती हो,
उसी क्षण
स्वतंत्रता शुरू होती है।
और याद रखो—
स्वतंत्रता के बिना
न गरिमा होती है,
न प्रेम।





