तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं

तुम्हारे लक्ष्य तुम्हारे नहीं

मन में उठने वाली
कोई भी लहर
अकेली नहीं उठती।
मन दुनिया से बना है,
और दुनिया
मन से।

आतंकी का लक्ष्य—
मारना।

एक का लक्ष्य—
मंदिर।
दूसरे का—
मस्जिद।

मक्खी का लक्ष्य—
गंदगी।

हार्मोन से चलती देह का लक्ष्य—
भोग।

लालची मन का लक्ष्य—
पैसा।

ऊबे हुए मन का लक्ष्य—
मनोरंजन।

निर्भर मन का लक्ष्य—
स्वीकृति।

असुरक्षित मन का लक्ष्य—
सहारा।

तो मन
आख़िर पीछा किसका करता है?
उसी का,
जिसके लिए
उसे प्रशिक्षित किया गया है।

मन कोई शुद्ध सत्ता नहीं,
यह तो
जमा किया हुआ कबाड़ है—
विचार,
डर,
इच्छाएँ,
उधार ली हुई पहचानें—
जिन्हें अहंकार
अपना समझ बैठा है।

इसलिए
यह मत कहो—
“यह मेरा लक्ष्य है।”

पूछो—
यह इच्छा आई कहाँ से?
किसने इसे बोया?
किसने इसे सींचा?

जब तक यह प्रश्न
नहीं उठता,
तब तक
तुम नहीं दौड़ रहे—
तुम्हें दौड़ाया जा रहा है।

और जिस दिन
तुम यह देख लेते हो,
कि लक्ष्य भी
उधार के हैं—
उसी दिन
पहली बार
स्वतंत्रता
संभव होती है।
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