लत का अंतिम इलाज
लत
कोई बीमारी नहीं,
एक खाली जगह है
जो शोर मचाती है।
तुम लौटते हो—
बार-बार—
क्योंकि
वहाँ कुछ मिलता है।
झूठा सही,
पर मिलता तो है।
अगर कुछ न मिलता,
तो तुम जाते ही क्यों?
टीवी दोषी नहीं।
मोबाइल दोषी नहीं।
पोर्न, पैसा, नशा—
कुछ भी दोषी नहीं।
दोष
तुम्हारी ज़रूरत है।
एक भीतर का
रोता हुआ गड्ढा,
जो कहता है—
“कुछ दो…
कुछ भी दो।”
तुम उसे
सस्ती चीज़ें थमा देते हो,
और वह
और भूखा हो जाता है।
तुम गाली देते हो
आदतों को,
पर सच यह है—
वे खुद चलकर
तुम्हारे पास नहीं आईं।
तुम
खुद
लार टपकाते हुए
उनके पास गए।
लत इसलिए है
क्योंकि
तुम्हारे पास
उससे बेहतर
कुछ नहीं है।
भीतर का जानवर
ऊँचाई नहीं समझता,
वह सिर्फ महसूस करता है।
उसे
कोसने से नहीं,
ऊँचा दिखाने से
शांत किया जाता है।
अपने जीवन में
कुछ बड़ा लाओ—
इतना बड़ा
कि
तुम्हारी इच्छाएँ
छोटी पड़ जाएँ।
कुछ सुंदर,
कुछ सच्चा,
कुछ ऐसा
जिसके सामने
सस्ते सुख
शर्म से सिर झुका लें।
जब उद्देश्य
प्यार बन जाता है,
तो लत
फुर्सत भी नहीं पाती।
तब ध्यान
तेज़ होता है,
चयन स्पष्ट होता है,
और भटकाव
बेमानी।
लत
ध्यान की कमी नहीं,
उद्देश्य की कमी है।
तुम खाली नहीं रह सकते
और स्वतंत्र भी।
इसलिए
इलाज
सलाह नहीं है,
डाँट नहीं है।
इलाज
एक सवाल है—
तुम
सबसे ऊँचा
क्या सोच सकते हो?
सबसे सुंदर
क्या कल्पना कर सकते हो?
और अगर वह इतना सुंदर है,
तो
अपनी ज़िंदगी
उसे क्यों नहीं देते?





