तुम आलसी नहीं हो, तुम प्रेमहीन हो

तुम आलसी नहीं हो, तुम प्रेमहीन हो

आलस्य
ऊर्जा की कमी नहीं है।
यह
समझ की कमी है।

तुम अपने भीतर की
भूमि को नहीं जानते—
इसलिए
यह भी नहीं जानते
कि कौन-सा कर्म
तुम्हें जीवित करेगा,
कौन-सा प्रयास
सचमुच फल देगा।

कर्म
ऊर्जा माँगता है।
और जब
उस ऊर्जा का
लाभ स्पष्ट न हो,
तो
मन
क्रिया के बजाय
निष्क्रियता चुन लेता है।

यही
आलस्य कहलाता है।

यदि तुमने
कभी
सही कर्म की
मिठास चखी होती—
उस अमृत को,
जो
जाग्रत होकर
कुछ सार्थक करने से
उपजता है—
तो
तुम
सुस्ती को
कभी नहीं चुनते।

क्योंकि
बिस्तर पर
अचेत पड़े रहने में
कौन-सा रोमांच है?

जागना
अतुलनीय है—
सजग,
जीवित,
और
भीतर से
जलता हुआ।

आलस्य से
तुम्हें
दो ही शक्तियाँ
बाहर खींच सकती हैं।

एक—
यह डर
कि तुम्हारे पास
केवल
एक ही जीवन है,
और उसे
औसतपन में
गँवाना
डरावना है।

यह डर
कमज़ोरी नहीं है।
यह
सम्मान है—
जीवन के प्रति।

और दूसरी शक्ति—
प्रेम।

कोई ऐसा प्रेम
जो
इतना बड़ा हो,
इतना सुंदर हो,
इतना अनिवार्य हो
कि
तुम
स्थिर ही न रह सको।

एक जलता हुआ हृदय।
एक बहता हुआ हृदय।
किसी ऊँचे सत्य के लिए
पागल हृदय।

जहाँ
सही डर है
या
सही प्रेम है—
वहाँ
आलस्य टिक नहीं सकता।

साहसी मन
समस्या नहीं सुलझाता।
वह
खुद को
सुलझा लेता है।

और जब
मन
खुद को समझ लेता है,
तो
क्रिया
स्वतः बहने लगती है—
बिना दबाव,
बिना ज़ोर,
बिना आलस्य।

तब
तुम काम नहीं करते।
तुम
जीते हो।

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