देह मुक्ति पर वीटो लगाएगी
जैसा है
वैसा मत छोड़ दो।
धारा के साथ मत बहो।
समय
तुम्हें नहीं बदलेगा।
अनुभव
तुम्हें नहीं जगाएगा।
चालीस हज़ार साल भी
जी लो—
तो भी
कुछ अपने आप
नहीं बदलेगा।
हम
सुख के इच्छुक हैं,
परिश्रम से बचने वाले।
किसी को काम कराना हो
तो
इनाम देना पड़ता है।
काम न कराना हो
तो
कुछ मत करो।
जड़ता
हमारी
स्वाभाविक सुविधा है।
मुक्ति
सबसे ऊँची उपलब्धि है—
और
सबसे कठिन मार्ग।
बंधन से लड़ना
जीवन का
सबसे ज़रूरी काम है—
और
सबसे कठिन भी।
इसलिए
देह
मुक्ति से बचती है।
टालती है।
देर करती है।
क्यों?
क्योंकि
उसे कीमत नहीं चुकानी।
उसे आग से नहीं गुजरना।
पर
अपरिहार्य से
बचा नहीं जा सकता।
आराम
स्थायी नहीं।
सुविधा
धोखा है।
पैसा,
प्रतिष्ठा—
बाहरी सुरक्षा।
पसंद-नापसंद,
स्वीकृति-अस्वीकृति—
भीतरी सुरक्षा।
इनमें से
कोई भी
वह नहीं देगा
जिसकी तुम्हें
तलाश है।
मुक्ति
हम सबका
लक्ष्य है—
चाहे हम
जानें या न जानें।
अंतर
केवल
मार्ग का है।
पर ठहरो—
जब तुम कहते हो
“मैं अपनी राह चुनूँगा”
तो
यह “मैं” कौन है?
तुम
दो हो।
एक
जो मुक्त होना चाहता है।
और एक
जो मुक्ति टालता है।
ये दोनों
साथ रहते हैं—
और
लगातार युद्ध में हैं।
एक-दूसरे को
पसंद नहीं करते—
फिर भी
अलग नहीं हो सकते।
अजीब विवाह है यह—
देह और चेतना का।
बराबरी
संभव नहीं।
क्योंकि
दोनों
अलग आयामों के हैं।
किसी एक को
प्राथमिकता
देनी ही होगी।
यदि जीवन
सही जीना है,
तो
चेतना को
आगे रखना होगा।
देह
सुनी जाए—
पर
निर्णय
उसका न हो।
क्योंकि
यदि बराबरी दी—
तो
देह
हर बार
मुक्ति पर
वीटो लगाएगी।
और
असल घटना
कभी घटेगी ही नहीं।





