पहले से ही घर
कुछ लोग
किसी मंज़िल के लिए
चलते हैं।
और कुछ
मंज़िल से ही
चलना शुरू करते हैं।
दूसरे
पहुँचें या न पहुँचें—
वे
पहले से
घर में होते हैं।
जो मानते हैं
कि दुनिया में
कुछ हासिल करने लायक
अंतिम चीज़ है,
वे
आशा में
भटकते हैं।
और कुछ
खिलाड़ी की तरह
पूरी ताक़त से खेलते हैं—
यह जानते हुए
कि यह
एक खेल है।
वे
डर से नहीं,
असुरक्षा से नहीं—
स्वतंत्रता से
लड़ते हैं।
पहले
शायद पहुँच जाएँ,
शायद नहीं।
दूसरे
कभी निकले ही नहीं—
इसलिए
कभी खोते भी नहीं।
परिस्थितियाँ
किसी को नहीं हरातीं।
वे
बाहर की चीज़ें हैं—
आती-जाती,
क्षणिक।
हार
अंदर होती है।
और
जो अंदर है,
वह
तुम्हारे क्षेत्र में है।
सभी गिरते हैं।
सभी
योजनाएँ टूटती हैं।
सभी
गति खोते हैं।
अंतर
घटना में नहीं—
प्रतिक्रिया में है।
क्या तुम
सिकुड़ जाते हो?
पीछे हटते हो?
स्वीकार कर लेते हो
कि अब बस यही है?
या फिर
झुके हुए भी
सीधे खड़े रहते हो—
खून में लथपथ भी
गरिमा के साथ?
जीत में
ताक़त आसान है।
विजय
झूठे नायक
पैदा करती है।
असली परीक्षा
वहाँ होती है
जहाँ
कारण हारता दिखे—
और तुम
फिर भी
ईमानदारी से
लड़ते रहो।
हार
कब्र भी बन सकती है।
और
रणभूमि भी।
और यदि संभव हो—
तो
जीत और हार
दोनों को
खेल का मैदान
बना दो।
जो जानते हैं
वे किसके लिए खड़े हैं,
जो
मंज़िल से चलना जानते हैं—
वे
चलते रहते हैं।
उनके कदम
प्रतिक्रिया नहीं होते।
वे
भीतरी सुरक्षा की
घोषणा होते हैं।
वे
पहले से
घर में होते हैं।





